गुरुवार, 2 सितंबर 2010

राजस्थान और हरयाणा का प्रमुख पेय है राबड़ी

राबड़ी राजस्थान और हरयाणा का प्रमुख पेय है जो कि काफी लोकप्रिय और सस्ता भी है और स्थानीय रूप से आसानी से तैयार हो जाता है. राबड़ी कोई बियर का नया ब्रांड नही है. ये एक अमृत है गर्मी से निजाद पाने के लिए. राबड़ी राजस्थन में जहा 45-50 डिग्री तापमान रह्ता है वहां ये वरदान है. लू के थपेड़ों में भी लोग इसको पी कर दोपहर में आराम से सोते है. यह गरमी के मौसम में अधिक प्रयोग की जाती है. जो पहली बार राबड़ी पिएगा, एक गिलास मे बेहोश नींद में सो जाएगा. आजकल राबड़ी पाँच सितारा होटलों मे भी उपलब्ध है और विदेशी पर्यटक बड़े चाव से राबड़ी का लुत्फ उठा रहे है. इस राबडी के साथ बाजरे की रोटी चूर कर खा सकते हैं या ठंडी राबडी में छाछ या दही और जीरा मिलाकर पी सकते हैं.

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राबड़ी के फायदे ही फायदे हैं:-
* यह तनाव कम कम करती
* इससे नींद अच्छी आती है
* कभी लू नही लगती है
* ब्लड प्रेशर नही होता है
* अस्थमा में भी लाभदायक है
* भूक अच्छी लगती है
* पेट की हर बिमारी में लाभ दायक है
* यह पथरी रोग ठीक करती है

मंगलवार, 18 मई 2010

मां-बेटी के दुखद आंकडे


देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं को लेकर जनगणना-2001 के आंकडे चौंकाने वाले रहे थे। ये आंकडे आज भी इतने चिन्ताजनक हैं कि इन पर तुरन्त और नियमित रूप से ध्यान देने की जरूरत है। हम पिछली जनगणना की रोशनी में देखें, तो आंखें खोलने वाले और आघात पहुंचाने वाले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-
पहला तथ्य :
शिशु लिंगानुपात पिछले 40 सालों में काफी गिरावट की ओर अग्रसर है। हमारे देश में 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में वर्ष 1961 में 1000 लडकों पर 976 लडकियां थीं। इसमें लगातार गिरावट जारी रही। 1971 में यह आंकडा 964, 1981 में 962, 1991 में 945 था और 2001 में तो 927 पर पहुंच गया।
दूसरा तथ्य :
ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में लिंग चयन ज्यादा किया जा रहा है। आंकडे दर्शाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 लडकों पर 946 लडकियां थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 900 ही थी।
तीसरा तथ्य :
शिक्षित परिवारों में अशिक्षित परिवारों की अपेक्षा गर्भपात के आंकडे अधिक रहे। स्नातक और इससे ऊपर शिक्षित महिलाओं द्वारा जन्म दिए 1000 बच्चों में से बालिकाओं की संख्या 876 ही रही, जबकि अशिक्षित या अल्प शिक्षित महिलाओं में यह संख्या 920 रही।
चौथा तथ्य :
धार्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो ईसाइयों की स्थिति सबसे अच्छी है। ईसाइयों में 1000 लडकों में से 964 लडकियां, मुस्लिमों में 950, बौद्धों में 942, हिन्दुओं में 925 और जैनियों में यह संख्या 870 है। सबसे बुरी स्थिति सिखों की है, जहां यह अनुपात 786 का ही था।
पांचवां तथ्य :
राष्ट्रीय औसत और राज्य व केन्द्रशासित प्रदेशों के आंकडे भी आंखें खोलने वाले हैं। वर्ष 2001 में लिंग अनुपात का राष्ट्रीय औसत 1000 : 927 था, जबकि महाराष्ट्र में यह अनुपात 913, राजस्थान में 906, हिमाचल प्रदेश में 897, गुजरात में 878, दिल्ली में 863, हरियाणा में 820, पंजाब में 793 था। चंडीगढ में यह अनुपात 745 का रहा, जो सबसे कम है।
छठा तथ्य :
विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले दस देशों में भारत की स्थिति काफी दयनीय रही। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा प्राप्त वर्ष 2009 के आंकडों के अनुसार, रूस में 1000 लडकों पर 1164, जापान में 1053, ब्राजील में 1031, अमरीका में 1023, इंडोनेशिया में 1003, नाइजीरिया में 995, बांग्लादेश में 978 और पाकिस्तान में 942 लडकियां थीं। भारत में यह अनुपात 936 का था। चीन प्रति हजार लडकों पर 927 लडकियों की संख्या के साथ सबसे नीचे पायदान पर था। इतना ही पर्याप्त नहीं है। एक स्वयंसेवी संगठन सेव द चिल्ड्रेन ने माताओं की स्थिति का सर्वे करते हुए एक रिपोर्ट कुछ ही दिन पहले जारी की है। मां बनने के अनुकूल परिप्रेक्ष्य में मध्य आय वर्ग के 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो मां बनने के लिए भारत सुरक्षित जगह नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों और उन्हें जन्म देने वाली माताओं की कुल मौतों की दो तिहाई संख्या अकेले भारत की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध उनके शैक्षणिक और सामाजिक-आर्थिक स्तर से जुडा है। हजारों महिलाओं की मौत सिर्फ इस वजह से हो जाती है कि उन्हें प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं। यदि मिलती भी हैं, तो उसकी गुणवत्ता नगण्य ही होती है। भारत में जहां बालिकाओं का अनुपात गिरावट की ओर है, वहीं मां बनने के लिए भी भारत सुरक्षित स्थान नहीं रहा। इस सबके बाद भी भारत के निवासी श्रद्धा के साथ देवियों की पूजा शक्ति, धन, स्वास्थ्य, विद्या, रक्षा, समृद्घि, शांति की अधिष्ठात्रि के रूप में करते हैं। यह पाखण्ड और ढोंग की चरमसीमा है। समस्या तो यह है कि पुरूषों और महिलाओं को यह सब विरासत में मिला हुआ है और उनकी सोच में जमा हुआ है। इसे बदलने की जरूरत है अन्यथा आने वाले समय में यह हमेशा हमारे समाज को हानि पहुंचाता रहेगा। सामाजिक संतुलन न होने से महिलाओं के खिलाफ अपराध बढेंगे। साथ ही, सामाजिक हिंसा का प्रतिशत भी बढेगा। खबरेंं हैं कि आयातित पत्नियों और साझा पत्नियों की ओर रूझान बढा है। मानव तस्करी की प्रवृत्ति भी बढी है।भारत में ऎसे अनेक कानून हैं, जिनका क्रियान्वयन नहीं होता है। जब हर कोई दहेज ले और दे रहा हो, तो कौन शिकायतकर्ता बने और कौन आरोपी और साक्ष्य कहां हैं कौन बयान देगा और बाद में अपने बयान से नहीं पलटेगा चूंकि कोई दण्ड नहीं है, इसलिए पाप सामाजिक चलन में शामिल हो गया है। एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि दहेज की प्रथा के चलते हम पुत्र को ही संतान के रूप में वरीयता देते हैं। हमें यह डर भी सताता रहता है कि जायदाद का हस्तान्तरण करना पडेगा, क्योंकि पुत्रियों को प्रवासी पक्षी के रूप में देखा जाता है। जो लोग समाज की इस चिन्ताजनक परिस्थितियों को बदलने में सक्षम हैं, उनका नैतिक दायित्व और कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आएं और काम करें। इस काम में सर्वाधिक भूमिका माता-पिता निभा सकते हैं। पुरूष और महिलाएं भी शिक्षा समेत विविध क्षेत्र में अगुवाई कर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए हालात बदल सकते हैं। भारत में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। यदि स्थितियां न बदली गई, तो युवाओं का भविष्य गम्भीर रूप से विकृत हो जाए
मां-बेटी के दुखद आंकडे


12 मई 2010, 09:26 hrs IST ईमेल
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देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं को लेकर जनगणना-2001 के आंकडे चौंकाने वाले रहे थे। ये आंकडे आज भी इतने चिन्ताजनक हैं कि इन पर तुरन्त और नियमित रूप से ध्यान देने की जरूरत है। हम पिछली जनगणना की रोशनी में देखें, तो आंखें खोलने वाले और आघात पहुंचाने वाले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-



पहला तथ्य : शिशु लिंगानुपात पिछले 40 सालों में काफी गिरावट की ओर अग्रसर है। हमारे देश में 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में वर्ष 1961 में 1000 लडकों पर 976 लडकियां थीं। इसमें लगातार गिरावट जारी रही। 1971 में यह आंकडा 964, 1981 में 962, 1991 में 945 था और 2001 में तो 927 पर पहुंच गया।

दूसरा तथ्य : ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में लिंग चयन ज्यादा किया जा रहा है। आंकडे दर्शाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 लडकों पर 946 लडकियां थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 900 ही थी।



तीसरा तथ्य : शिक्षित परिवारों में अशिक्षित परिवारों की अपेक्षा गर्भपात के आंकडे अधिक रहे। स्नातक और इससे ऊपर शिक्षित महिलाओं द्वारा जन्म दिए 1000 बच्चों में से बालिकाओं की संख्या 876 ही रही, जबकि अशिक्षित या अल्प शिक्षित महिलाओं में यह संख्या 920 रही।



चौथा तथ्य : धार्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो ईसाइयों की स्थिति सबसे अच्छी है। ईसाइयों में 1000 लडकों में से 964 लडकियां, मुस्लिमों में 950, बौद्धों में 942, हिन्दुओं में 925 और जैनियों में यह संख्या 870 है। सबसे बुरी स्थिति सिखों की है, जहां यह अनुपात 786 का ही था।



पांचवां तथ्य : राष्ट्रीय औसत और राज्य व केन्द्रशासित प्रदेशों के आंकडे भी आंखें खोलने वाले हैं। वर्ष 2001 में लिंग अनुपात का राष्ट्रीय औसत 1000 : 927 था, जबकि महाराष्ट्र में यह अनुपात 913, राजस्थान में 906, हिमाचल प्रदेश में 897, गुजरात में 878, दिल्ली में 863, हरियाणा में 820, पंजाब में 793 था। चंडीगढ में यह अनुपात 745 का रहा, जो सबसे कम है।



छठा तथ्य : विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले दस देशों में भारत की स्थिति काफी दयनीय रही। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा प्राप्त वर्ष 2009 के आंकडों के अनुसार, रूस में 1000 लडकों पर 1164, जापान में 1053, ब्राजील में 1031, अमरीका में 1023, इंडोनेशिया में 1003, नाइजीरिया में 995, बांग्लादेश में 978 और पाकिस्तान में 942 लडकियां थीं। भारत में यह अनुपात 936 का था। चीन प्रति हजार लडकों पर 927 लडकियों की संख्या के साथ सबसे नीचे पायदान पर था।



इतना ही पर्याप्त नहीं है। एक स्वयंसेवी संगठन सेव द चिल्ड्रेन ने माताओं की स्थिति का सर्वे करते हुए एक रिपोर्ट कुछ ही दिन पहले जारी की है। मां बनने के अनुकूल परिप्रेक्ष्य में मध्य आय वर्ग के 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो मां बनने के लिए भारत सुरक्षित जगह नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों और उन्हें जन्म देने वाली माताओं की कुल मौतों की दो तिहाई संख्या अकेले भारत की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध उनके शैक्षणिक और सामाजिक-आर्थिक स्तर से जुडा है। हजारों महिलाओं की मौत सिर्फ इस वजह से हो जाती है कि उन्हें प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं। यदि मिलती भी हैं, तो उसकी गुणवत्ता नगण्य ही होती है। भारत में जहां बालिकाओं का अनुपात गिरावट की ओर है, वहीं मां बनने के लिए भी भारत सुरक्षित स्थान नहीं रहा। इस सबके बाद भी भारत के निवासी श्रद्धा के साथ देवियों की पूजा शक्ति, धन, स्वास्थ्य, विद्या, रक्षा, समृद्घि, शांति की अधिष्ठात्रि के रूप में करते हैं। यह पाखण्ड और ढोंग की चरमसीमा है। समस्या तो यह है कि पुरूषों और महिलाओं को यह सब विरासत में मिला हुआ है और उनकी सोच में जमा हुआ है। इसे बदलने की जरूरत है अन्यथा आने वाले समय में यह हमेशा हमारे समाज को हानि पहुंचाता रहेगा। सामाजिक संतुलन न होने से महिलाओं के खिलाफ अपराध बढेंगे। साथ ही, सामाजिक हिंसा का प्रतिशत भी बढेगा। खबरेंं हैं कि आयातित पत्नियों और साझा पत्नियों की ओर रूझान बढा है। मानव तस्करी की प्रवृत्ति भी बढी है।



भारत में ऎसे अनेक कानून हैं, जिनका क्रियान्वयन नहीं होता है। जब हर कोई दहेज ले और दे रहा हो, तो कौन शिकायतकर्ता बने और कौन आरोपी और साक्ष्य कहां हैं कौन बयान देगा और बाद में अपने बयान से नहीं पलटेगा चूंकि कोई दण्ड नहीं है, इसलिए पाप सामाजिक चलन में शामिल हो गया है। एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि दहेज की प्रथा के चलते हम पुत्र को ही संतान के रूप में वरीयता देते हैं। हमें यह डर भी सताता रहता है कि जायदाद का हस्तान्तरण करना पडेगा, क्योंकि पुत्रियों को प्रवासी पक्षी के रूप में देखा जाता है। जो लोग समाज की इस चिन्ताजनक परिस्थितियों को बदलने में सक्षम हैं, उनका नैतिक दायित्व और कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आएं और काम करें। इस काम में सर्वाधिक भूमिका माता-पिता निभा सकते हैं। पुरूष और महिलाएं भी शिक्षा समेत विविध क्षेत्र में अगुवाई कर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए हालात बदल सकते हैं। भारत में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। यदि स्थितियां न बदली गई, तो युवाओं का भविष्य गम्भीर रूप से विकृत हो जाए

शनिवार, 1 मई 2010

ग्रामीण क्षेत्रों में चारे के भाव आसमान छू रहे।


रानीवाडा .बारिश की कमी व चारे की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में चारे के भाव आसमान छू रहे हैं। ज्वार की कुट्टी गेहूं से भी महंगी हो गई है। ज्वार की कुट्टी तो चारा डिपो से गायब सी हो गई है। ऐसे में काश्तकार पशुओं को खाखला खिला रहे हैं। ज्वार की कुट्टी मध्यप्रदेश से आ रही है। ब्यावर, किशनगढ़ व केकड़ी क्षेत्र में इसके भाव 1275 से 1300 रुपए क्विंटल हैं। गेहूं के भाव राशन की दुकानों पर एपीएल फ्रीसेल तक 1250 रुपए क्विंटल हैं। एपीएल में भी रेग्यूलर व स्पेशल की दर इससे भी कम है लेकिन काश्तकार पशुओं की सेहत के लिए मजबूरन ज्वार की कुट्टी भी खिला रहे हैं। हालांकि चारा महंगा होने के कारण अधिसंख्य काश्तकार ज्वार की कुट्टी खरीद ही नहीं पा रहे, वे पशुओं को खाखला (भूसा) खिला रहे हैं। दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए काश्तकार खाखले में डेयरी का पशु आहार मिला रहे हैं। झालावाड़ व कोटा से आने वाले खाखले में सिर्फ 130 रुपए क्विंटल की सब्सिडी होने के कारण काश्तकार मध्यप्रदेश से आने वाला खाखला ही खरीद रहे हैं। इस पर दो सौ रुपए क्विंटल की सब्सिडी है। मध्यप्रदेश से आने वाली ज्वार की कुट्टी पर सौ रुपए क्विंटल की सब्सिडी भी बंद कर दी गई है।





देश नहीं दिल देखकर किया प्यार: सानिया

 नई दिल्ली. देश नहीं सीरत देखकर मेरा दिल शोएब पर आया था। पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के साथ शादी को लेकर पिछले दिनों मीडिया में चर्चित रही भारतीय टेनिस स्टार सानिया मिर्जा ने कहा। साथ हि उन्होंने यह खुलासा किया है कि उन्हें अपने शौहर से तीसरी नजर में ही प्यार हुआ था।काफी विवाद और हो हल्ले के बाद सानिया और शोएब ने 12 अप्रैल को शादी रचाई थी। शादी से फुर्सत पाते ही इस नए जोडे ने एक निजी टीवी चैनल से बातचीत में कहा, पिछले कुछ दिनों में हमारी शादी को लेकर काफी विवाद हुए। लेकिन खुदा का लाख लाख शुक्र है कि अब सबकुछ ठीक है।
यह पूछने पर कि आयशा सिद्दकी ने शोएब के साथ फोन पर शादी करने का दावा किया जिसके बाद शोएब को आयशा से तलाक लेना पडा था इस पर सानिया ने कहा, हर किसी का अतीत होता है। मैं और मेरे परिवार वाले इस बात को जानते थे। उन्होंने कहा, मीडिया में जो खबरे दिखाई गई वो सही नहीं थी और शोएब ने मुझे धोखा नहीं दिया।शोएब के पाकिस्तानी होने के सवाल पर टेनिस परी ने कहा, मुझे शोएब की सादगी ने दीवाना बना दिया था। जब मैंने प्यार किया तब मैंने उनकी राष्ट्रीयता नहीं बल्कि उनका दिल देखा था। हां ये सही है कि हमारे रिश्ते को भारत-पाकिस्तान के नजरिए से देखा जा रहा है। पर मैंने इंसान देखा था उसका देश नहीं।सानिया ने अपने इजहारे मुहब्बत को बयां करते हुए कहा कि वह पहली बार शोएब से आस्ट्रेलिया में मिली थीं। उन्होंने कहा, हम एक ही होटल में रूके हुए थे। मेरी नजर जिम जाते वक्त शोएब से मिली। इसके बाद हम दुबई में फिर मिले और वहां प्यार हो गया। आप इसे तीसरी नजर का प्यार कह सकते हैं।

कुत्तों के लिए ब्लड बैंक

 स ब्लड बैंक को तमिलनाडु वेटरिनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी ने शुरू किया है। यह उन लोगों के लिए बडी राहत लेकर आया है, जो अपने पालतू कुत्तों के इलाज के लिए भटकते हैं और जरूरत के अनुरूप ब्लड न मिलने पर निराश हो जाते हैं। इंसानों की तरह ही जानवरों में भी यदि वक्त रहते खून चढाया जाए, तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। दुनिया में ऎसी कई मिसालें हैं, जिनमें कई लोगों ने पैसे की परवाह न करते हुए अपने पालतू साथी का जटिल ऑपरेशन कराया हो और उसकी जान बचाई हो।
ब्लड डोनर्स का अभाव
यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉक्टर पी. थंगाराजू का कहना है कि ऎसे ब्लड बैंक की बहुत ज्यादा जरूरत थी, क्योंकि उनके पास सप्ताह में कम से कम दो ऎसे मामले आते हैं, जिन्हें खून की बेहद जरूरत होती है। देश में अब तक ऎसा कोई ब्लड बैंक नहीं था। साथ ही, ब्लड कलेक्शन और ब्लड स्टोरेज जैसी कोई सुविधा देश में मौजूद नहीं थी। इसके अलावा ब्लड डोनर्स का अभाव भी एक बडी समस्या रही। जब भी रक्त की जरूरत पडती, तो डोनर्स ही नहीं मिलते थे। या कई बार डोनर के मिलने में इतनी देर हो जाती, कि मरीज कुत्ता अपनी जान गंवा बैठता था।
कुत्तों के भी ब्लड टाइप
ब्लड बैंक इंचार्ज डॉक्टर एस. प्रथाबन ने बताया कि ब्लड टाइपिंग भी एक समस्या रहा करती थी, क्योंकि इंसानों की तरह कुत्तों के भी ब्लड टाइप्स होते हैं। लेकिन अब इस समस्या से निजात मिल गई है और टाइपिंग भी संभव हो सकी है। डोनर्स को प्रोत्साहन देने के लिए तमिलनाडु वेटरिनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी ने एक स्कीम भी शुरू की है जिसके तहत डोनर को एक हजार रूपए का ग्रीन कार्ड दिया जाएगा ताकि वे अस्पताल पहुंचते ही अपना ट्रीटमेंट मुफ्त में करवा सकें। ग्रीन कार्ड एक साल तक के लिए वैध होगा। देश में अपनी तरह के पहले ब्लड बैंक में पहला ब्लड डोनर 'हॉट डॉग' नामक कुत्ता बना है। संस्थान का प्रयास है कि वह देशभर में पालतू जानवर रखने वाले लोगों के बीच इस बात की जागरूकता फैलाएं कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में अपने पालतू साथी को रक्तदान के लिए वहां लाएं।

शनिवार, 27 मार्च 2010

मौत को मात

 मारवाड़। हैती की राजधानी पोर्ट ओ प्रिंस में पानी पीते ये हैं अन्ना जिजि। यह कोई साधारण नहीं बल्कि मौत को मात देने वाला व्यक्ति है। गत सप्ताह यहां आए जबरदस्त भूकंप में जिजि अपने घर के मलबे में दब गए। ..और एक सप्ताह बाद राहत व बचावकर्मियों ने इन्हें बाहर निकाला। वह भी सही सलामत।

शनिवार, 20 मार्च 2010

कैसे बीतेंगे दो वैशाख!

 रानीवाडा । अभी तो चैत्र है, लोग ज्येष्ठ की दुपहरी की कल्पना मात्र से चिंता में है। ज्येष्ठ तो आएगा तब आएगा, उससे पहले दो वैशाख कैसे गुजरेंगे! भारतीय महीनों के चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ ग्रीष्मकाल में शुमार माने जाते हैं। आषाढ आते-आते आसमान में बादलों की उपस्थिति राहत के संकेत लेकर आती है। इसके बाद सावन का महीना बरखा बहार का होता है। अगर इस आधार पर गणना करें तो इस बार चार के बजाय पांच माह गर्मी के होंगे। इसका कारण है कि इस बार वैशाख दो हैं। शुद्ध वैशाख 31 मार्च से शुरू होगा। इसके बाद 15 अप्रेल से 14 मई तक अघिक वैशाख [पुरूषोत्तम मास] रहेगा। फिर शुद्ध वैशाख 27 मई को खत्म होगा। 28 से चलने वाला ज्येष्ठ मास 26 जून तक तथा इसके बाद आषाढ 26 जुलाई तक रहेगा। अगर बादलों ने इस बार जल्दी रूख नहीं किया तो अघिक वैशाख के कारण गर्मी ज्यादा दिन झेलनी पडेगी। शुक्रवार भी तपा: शुक्रवार को भी गुरूवार की तरह दिन का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस पर ही रहा। गुरूवार रात का तापमान 22.2 डि.से. दर्ज किया गया जो बुधवार रात के तापमान के करीब था। ऎसे में दिन भर तपन रही। घरों में अब पंखों के साथ कूलर भी चलने लगे हैं। कार्यालयों में एसी. शुरू हो गए हैं। बाजारों में कूलर की मांग बढ गई है।



अस्तित्व खो रही कलात्मक छतरियां

रानीवाडा 1   कस्बे के उत्तर दिशा में पहाडी के ऊपर पूर्व ठिकाने के जागीरदारों की शमशान भूमि में निर्मित ऎतिहासिक एवं कलात्मक छतरियों की देखभाल नहीं होने के कारण ये छतरियां ध्वस्त होकर खंडहर के रूप में तब्दील हो रही हैं।
ऎतिहासिक पहाडी पर सतियों के देवल के नाम से भव्य एवं कलात्मक छतरियां यहां आने वाले देशी विदेशी पर्यटकों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सैकडों वर्ष पुरानी इन छतरियों के देखरेख के अभाव में ये धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होकर खंडहर के रूप में बदल रही हंै। कई छतरियां तो अपना अस्तित्व भी खो चुकी है। जिसके खम्भे, चौकियां, छ"ो व कमानीदार दरवाजे वहां टूटे हुए व बिखरे हुए पडे हैं। ये छतरियां स्थानीय पूर्व जागीरदारों व चंपावत वंशीय राजपूतों के शमशान में स्थित हंै, जो इन्हीं के पूर्वजों की स्मृति में स्मारक के रूप में उनके वंशजों की ओर से बनवाई गई है। इसमें मुख्य रूप से तत्कालीन ठाकुर महासिंह, भभूतसिंह, गुमानसिंह चंपावत सहित उनकी महारानियों की मृत्यु के बाद उनके वंशजों ने बनवाई थी। जिनकी देखरेख व पूजा-अर्चना भी उन्हीं की ओर से की जाती है। धीरे धीरे समय के साथ ये छतरियां अब जीर्ण शीर्ण होकर क्षतिग्रस्त हो रही हैं।
कभी लगते थे मेले
ऎतिहासिक मान्यताओं के अनुसार सैकडों वर्ष पूर्व तत्कालीन जागीरदारों की मृत्यु के पpात् उनकी धर्मपत्नियां उनके साथ सती हो जाया करती थीं। इसी के चलते इन छतरियों के सतियों के देवल के नाम से पहचाना जाता है। इन्हीं छतरियों पर वर्ष में एक बार भव्य मेला लगता था। जहां इन सतियों के देवल की पूजा-अर्चना व नवदम्पती की जात भी दी जाती थी लेकिन दिवराला सतीकांड के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय की ओर से सती महिमा मंडन पर लगाई गई रोक के पpात् यहां मेलों का आयोजन हो रहा है।
हो रही है उपेक्षा
जैसलमेर जिले में पर्यटन विकास व पुरातत्व धरोहरों के संरक्षण को लेकर चल रहे सरकारी महकमें की ओर से भी इन पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण को लेकर कभी भी कोई पर्याप्त इंतजाम व कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। चंूकि चार वर्ष पूर्व जिला प्रशासन की ओर से शक्तिस्थल से इन छतरियों तक डामर सडक का निर्माण करवाया गया था ताकि पर्यटक इन छतरियों तक आसानी से पहुंचे सके लेकिन इन छतरियों के संरक्षण व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।



बुधवार, 17 मार्च 2010

घूटियों भर नै बचाय लिया राज

एक नटणी आपरै झीणा करतबां सू सगळा मुलक में चावीही। एकर उदैपुर में उण री रांमत मंडी। राणौजी नटणी ने कह्यौं-एड़ी रांमत बता जिकी ली कोंई नीं देखी व्हैं। नटणी कह्यौं-बड़ौं काम, म्हैं तौ करतब जाणूं, पण देखण वाळा री ई सरधा चाहीजे। आप देखी चावौं तौ म्हैं भरत माथै पीछोला पार कर जावूं। रांणौजी नै विसवार नीं व्हियौ। अंचभा सूं पाछै खरायौ, कंाई पीछोला ? नटणी कह्यो-हां, पीछौला। आपनै दीखै आ पीछौला।अेकर छोड, भरत माथै चार वळा फिर जावूं। रांणौजी जांणियौ के आ बात ई कोई व्हैणी हैं ! वै कह्यौं - थे, थूं पीछौला भरत माथै अेक वळा ई पार कर जावै तौ मैवाड़ रौ आधौ राज थारै नांव कर दूं। जे पार नीं व्हीं तौ म्हारौ राज छौड़नै किणी दूजा रजवाड़ा में थू रांमत नीं मांड़ सकेला। पीछोला री इण तीर सू उण तीर भरत बांधीजी। नटणी रांतम करण सारू भरत माथै चढी। अलेखूं निजरां नटणी रै पगां साम्हीं पड़ी। ओ कंाई! व तौ जमीं माथै चालै ज्यूं भरत माथै चालण ढूकी।देखण वाळां रा सांस ऊंचा चढग्या। रांणौजी रौ काळजौ उंचै चढग्यौं। ठाकर ठेठर कह्यो-हजारूं माथा दियां जकां नै ई मेवाड़ री पांती नीं मिळी अर आप इण नटणी री रांमत माथै आधौ राज देवणौ कबूल कर लियौ, अंदाता जुलम हैं। रांणौजी देखियौ के नटणी तो आधेटै पूगण वाळी हैं। नटणी तौ पीछोला पार जावैला। पार करियां आधौ राज देवणौ पड़ैला। नटे ई कीकर! मेवाड़ री आंन माथै पांणी फिर जावैला। जबांन में बंधग्यौ। पाखती ई अेक जाट उभौ हौ। कह्यौं-अनदांता कोप नीं करै तौ म्है उपाव कर दूं। जाट कह्यौ-जे इण सूं बांजी अर आंन रैवती व्हैला तौ म्है राख देवूंला। वौ तीर रै पाखती ई नटिया रै डैरै पूंगौ। नटणी आधेटा सूं सली पार व्हेगी। उणरै हांचळा में फेर पांनौ आवण ढूकौ हौ। वा आपरा बेटा रौ ध्यांन करियौ। वा फेर खाथी सिरकण ढूकी। पांणी रै हिबोळां रै टाळ कोई आवाज नीं ही। जांणै आवाज खुद सूं चिराळी सुणीजी। चिराळी नटणी रै कानां पूगी। वा तुरंत आपरै बैटठा री चिराळी ओळख लीवी। रांमत करती मां रौ ध्यान चूकौ। नटणी तौ भरत माथा सूं पीछौला री लैरां मंे पडग्यी। चैधरी रै पाखती आतां ई ठाकर ठेठर कह्यौ-तरवारां सूं राज नीं बचै जकौ औ जाट बाळक रै चूंटिया भरनै बचाय लिया।

सोमवार, 8 मार्च 2010

शादी के सात माह बाद पत्नी पैसा लेकर छू!

अहमदाबाद. यहां पर एक महिला ने शादी के सात माह तक पति संग रहने के बाद उसने अपना गिरगिट का रंग दिखा दिया। जैसे ही सात माह पूरे हुए पत्नी ने एक लाख रुपया और घर का कीमती सामान लेकर रफूचक्कर हो गई। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले अमराईवाडी पुलिस स्टेशन ने शादी कराने के लिए पैसा कमाने वाले गिरोह का पर्दाफास किया था। उसके बाद नरोडा में इस प्रकार की घटना सामने आई जिसके बाद पुलिस के कान फिर से खड़े हो गए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार नरोडा ठक्करनगर निकोल गांव में गणपतभाई रावलीभाई परमार ने खेडा जिला के नडियाद के वसो गांव के शंकरभाई वालजीभाई परमार की लड़की मीना के साथ 2008 में शादी की थी। जिसके बाद इन दोनों में तकरार हो जाने की वजह से अलगाव हो गया। मीना से दूसरी बार शादी करने के लिए जब गणपतभाई ने उसके परिवार वालों से बात की तो उन्होंने 21 हजार रुपए की मांग की। इसके बाद गणपतभाई ने मीना की मांग को स्वीकार करते हुए पैसा दे दिया। शादी के सात माह बाद मीना ने घर से नगदी समेत कीमती समाना लेकर रफूचक्कर हो गई। गणपत भाई ने नरोडा पुलिस में मामला दर्ज करा दिया है। पुलिस मीना और उसके परिवार के सदस्यों की खोजबीन कर रही है।



पति की चिता को पत्नी ने दी मुखाग्नि

राजकोट. प्रेमविवाह करने वाले जोड़ों को परिवार और समाज में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर प्रेमविवाह का विरोध करने वाले परिवार और समाज अपने बच्चों को माफी देकर स्वीकार कर लेते हैं लेकिन कुछ ऐसे परिवार वाले होते हैं जो बेटे-बेटियों की मौत के बाद भी इनसे दूरी बनाए रखते हैं।भावनगर में एक प्रेमीजोड़े के साथ कुछ इसी तरह की घटना घटी। प्रेमविवाह को परिवार वालों ने नहीं स्वीकारा और इन्हें परिवार से अलग कर दिया गया। मोरबी के जांबुडिया गांव में मेहनत-मजदूरी करने वाले एक जोड़े पर कुदरत का कहर ऐसे टूटा कि सब कुछ तितर-बितर हो गया। आकस्मिक घटना में पति की मौत हो जाने के बाद भी परिवार वालों ने कोई खोज-खबर नहीं ली। यहां तक कि पति के अंतिम क्रियाकलाप में भी कोई नहीं आया जिसके बाद पत्नी ने अपने दिल पर पत्थर रखकर पति की चिता को मुखाग्नि दी।
गौरतलब है कि भावनगर के समढियाणा गांव में अतुल खोडाभाई मकवाणा ने बरवा गांव की मंजुला नाम की लड़की से प्रेम विवाह किया था। परिवार वालों ने इन दोनों की शादी को अस्वीकार करके इन्हें परिवार से बेदखल कर दिया। ये दोनों गांव के खेत में घर बनाकर अपना जीवन-यापन शुरु कर दिया। आठ साल से दिन-रात मेहनत मजदूरी करने वाले इस जोड़े को भगवान खुश न देख सके। खबर के मुताबिक 25 फरवरी को अतुल मकवाणा जांबुडिया गांव के हाईवे पर स्थित होटल में शराब पीने के लिए गया हुआ था। इस होटल में गैस फटने की वजह से अतुल गंभीर रूप से घायल हो गया जिसे पास के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां पर अतुल की मौत हो गई।





इन्हें दुल्हनिया कौन बनाएगा

 राहुल के स्वयंवर में हारी निकुंज और हरप्रीत का अब क्या होगा। चूंकि डिम्पी मिसेस महाजन बन चुकीं है, सवाल अब ये उठता है कि आखिर निकुंज मलिक और हरप्रीत से शादी कौन करेगा। पूरा देश देख चुका है कि इन दोनों ने राहुल के लिए प्यार की पींगे भरी थी। उनके साथ डेट पर गई, राहुल के लिए सेक्सी अंदाज में डांस भी किया। तो सवाल ये है कि शो में आने से पहले सामान्य परिवार की इन दोनों लड़कियों को अब कौन पत्नी स्वीकार करेगा।राहुल ने खुलकर शो पर उन सभी लड़कियों के साथ फ्लर्ट किया, उन्हें चूमा भी और गले भी लगाया। इस सबके बाद सभी लड़कियां सेलिब्रिटी तो बन गई लेकिन मिसेस महाजन केवल डिम्पी बन पाई। हां अगर ये मॉडलिंग या किसी इसी तरह की फील्ड में अपना करियर बनाने यहां आई थी तो फिर तो आना सफल रहा, लेकिन अगर सचमुच सिर्फ राहुल की दु्ल्हनियां बनने आई थी तो बेचारी हरप्रीत निकुंज और उन सारी लड़कियों का क्या होगा ये बड़ा सवाल है।चलो बाकी लड़कियों की बात छोड़ भी दें तो, निकुंज और हरप्रीत तो राहुल की नाम की मेहंदी लगा चुकी थी, हल्दी भी लगवाई थी, चुनरी भी ओढ़ी थी। क्या ये दोनों वह सब भूल पाएंगी, या उन्हें दोबारा दुल्हन बनाते समय लोग वो सारी बातें भूल पाएंगे।





ऊंचा होता आकाश

मैंने अब तक कि जिंदगी में अपने चारों ओर जितनी तेजी से औरतों की दुनिया को बदलते देखा है, उस गति से शायद ही कुछ और बदला हो। स्त्री ने शून्य से उठकर शिखर तक का सफर तय किया है। अब तक जिस दुनिया के दरवाजे उनके लिए बंद थे, उन्होंने हर उस दरवाजे को खटखटाया और वहां अपने लिए जगह बनाई। उन्होंने उन इलाकों में घुसपैठ की, जो अब तक सिर्फ पुरुषों के क्षेत्र समझे जाते थे। स्त्री का यह सफर बहुत लंबा और कीमती है क्योंकि उसने शून्य से शुरुआत की थी। औरत ने यह करके दिखाया है कि वह किसी भी मामले में पुरुषों से कम या कोई सेकेंड सेक्स नहीं है। मन, बुद्धि, अंतरात्मा, मेधा और कौशल हर चीज में वह उतनी ही संपूर्ण मनुष्य है, जितना कि कोई पुरुष। स्त्री के ऊंचे होते आकाश ने हमें आंखें ऊंची करके उसकी ओर देखने के लिए मजबूर किया है।एक दूसरा चेहरा भी है। बेशक बंधनों को तोड़कर, नियमों को दरकिनार करके अपनी जगह बनाने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। आज भी हमारे देश की बहुसंख्यक स्त्रियां पितृसत्तात्मक पाबंदियों के बीच एक छोटी सी दुनिया में जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। जिंदगी, जहां कोई खिड़की नहीं खुलती, जहां से होकर कोई राह नहीं निकलती, जहां न सूरज उगता है, न रोशनी की किरण फूटती है। जहां हवाओं की आवाजाही पर भी पहरे हैं। सारी उन्नति के बावजूद ये भी इस उन्नत देश की स्त्रियों की एक शक्ल है, जिससे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। पर वक्त के साथ बदलाव की उम्मीदें और-और पुख्ता होती जाती हैं।आज उम्र के इस पड़ाव पर जब तीस साल पहले की दुनिया को लौटकर देखती हूं तो सुख और आश्चर्य से भर जाती हूं।
आज औरत अपनी आंखों में ढेर सारी चमक लिए कितने आत्मविश्वास से भरी हुई है। वो ज्ञान की चमक से रोशन है, वह दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना रही है। अब वह सिर्फ रिश्तों में, किसी की मां या किसी की पत्नी के रूप में ही नहीं जानी जाती। उसकी अपनी एक आजाद हैसियत है। उसके विचार ओढ़े हुए या किसी और के लादे हुए नहीं हैं। वह संसार को अपनी निगाहों से देख रही है। अपनी तरह से गढ़ रही है।उनके रहन-सहन और पहनावे में भी बहुत फर्क आया है। हमने जिंदगी भर सिर्फ साड़ी या सलवार-कुर्ता ही पहना। आज तो लड़कियां परिधान के भी बने-बनाए नियमों और बंधनों से भी बाहर निकल रही हैं। हर मामले में उनकी अपनी पसंद-नापसंद है। अब वो सिर्फ सिर हिलाने वाली कठपुतली भर नहीं हैं। अब वह आगे बढ़कर पूरी शिद्दत से ‘ना’ भी कह सकती हैं।सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। इन बदलावों का जहां एक सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है, वहीं कुछ नकारात्मक असर भी नजर आते हैं। स्त्री ने तो अपनी सीमाओं को तोड़ा और बहुत आगे निकल गई, लेकिन पुरुष अब भी वहीं के वहीं हैं। बदलती हुई स्त्री के साथ-साथ पुरुष बदलने को तैयार नहीं हैं। घर से बाहर निकलकर पुरुषों के क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली औरत से भी घर के भीतर पुरुष की अपेक्षाएं वही पचास साल पुरानी हैं। घर की सीमाओं में पुरुष उसके कार्यक्षेत्र को साझा करने के लिए तैयार नहीं है। लिहाजा रिश्तों में एक किस्म का असंतुलन पैदा हुआ है। तलाक, अलगाव और बिना शादी के अकेली रहने वाली स्त्रियों की संख्या बड़े शहरों और महानगरों में बहुत तेजी से बढ़ रही है।





पलों में मिट गया पीढ़ियों का अंधेरा

बाड़मेर. सूजी देवी ने छह साल पहले बेटे को जन्म तो दिया लेकिन उसकी सूरत देख नहीं सकी, क्योंकि वह जन्म से मोतियाबिंद की शिकार थी। उसकी पीड़ा तब और बढ़ गई जब उसे पता चला कि जिसे उसने जन्म दिया है, उसे भी मोतियाबिंद है, लेकिन कहते हैं कि जो पीड़ा देता है, वही उसे दूर भी करता है। बाड़मेर जिले की चाडों की ढाणी के जगताराम की झोली खुशियों से और उसकी पत्नी व बेटे की जिंदगी अनगिनत रंगों से भर गई। अब सूजी देवी और उसका छह साल का बेटा दोनों ही जान गए हैं कि आकाश नीला होता है और गुलाब कई रंगों का होता है। पैरों में गांठों की वजह से विकलांग जगताराम ने जीवन में परेशानियां झेलीं।उसने कुछ साल पहले मोतियाबिंद के कारण अंधेरों में जीने वाली सूजी देवी से विवाह कर उसका जीवन संवारने का फैसला किया। सूजी के पिता भी जन्म से मोतियाबिंद के शिकार थे। छह साल पहले सूजी ने बालाराम को जन्म दिया तो जगताराम और सूजी दोनों ही दुखों के सागर में डूब गए क्योंकि बालाराम भी मोतियाबिंद का शिकार निकला। मां और बेटा एक दूसरे की सूरत तक नहीं देख पाए। जीवन अपनी गति से चल रहा था कि पिछले दिनों नेत्र ज्योति अस्पताल में नेत्र चिकित्सा शिविर लगा। इसमें पालनपुर से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों को सूजी और बालाराम की आंखों में छिपी रोशनी की किरणों दिखाई दीं। डॉ. रामलाल, डॉ. दक्षेस मोदी और बाड़मेर के डॉ. डीके स्वर्णकार ने इन मां-बेटे की आंखों का ऑपरेशन किया। शनिवार को दोनों की पट्टी खोली गई तो सभी खुशी से उछल पड़े। सूजी ने अपने लाल और उसके पिता को देखा तो उसकी आंखें गीली हो गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकता नहीं
जागरूकता के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मोतियाबिंद का इलाज कराने आगे नहीं आते। जन्म से ही मोतियाबिंद के शिकार मां और बेटा अब दुनिया देख सकेंगे।

महिला आरक्षण बिल आज पेश नहीं होगा

नई दिल्‍ली. राज्‍यसभा में महिला आरक्षण बिल पर बचे बवाल को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। जिसके बाद यह साफ हो गया है कि यह बिल भले ही राज्‍यसभा में पेश कर दिया गया हो लेकिन इस पर वोटिंग आज नहीं होगी।
राज्‍य सभा में पहुंचे मार्शल राज्‍यसभा में राजेडी और सपा सांसदों के हंगामे के बीच सांसदों को काबू करने के लिए मार्शल बुला लिए गए हैं। कई बार राज्‍यसभा को स्‍थगित करने के बाद शाम छह बजे इस बिल को पास करने के लिए वोटिंग करवाने का फैसला किया गया था। राज्‍यसभा में बिल को पेश कर दिया गया है। राजेडी सांसदों के द्वारा सभापति हामिद अंसारी से छीनकर बिल की प्रतियों को फाड़ने पर इन सांसदों पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है। इनके खिलाफ अनुशासनत्‍मक कार्रवाई की जा सकती है।
मुलायम-लालू ने समर्थन वापस लिया
समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने कहा है कि अगर महिला आरक्षण विधेयक वर्तमान स्वरुप में ही संसद से पारित हो जायेगा तो वे मनमोहन सरकार से समर्थन बकायदा वापस ले लेंगे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने आज यहां संसद परिसर में पत्नकारों के सामने घोषणा की। दोनों नेता महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस पर प्रहार करते हुए यह घोषणा की। उन्होंने सरकार से इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए कहा कि सरकार ने इस विधेयक को पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों से सलाह- मशविरा नहीं किया।





साईं भक्ति की आड़ में चलता था देह व्यापार

नई दिल्ली. पुलिस ने एक ऐसे हाई प्रोफाइल स्वामी को गिरफ्तार किया है, जो दुनिया के सामने साईं प्रवचन देता और मंदिर का संचालन करता लेकिन इसकी आड़ में वह धड़ल्ले से देह व्यापार का धंधा चला रहा था। पुलिस ने इस स्वामी समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है जिसमें से एक दलाल है व छह लड़कियां हैं। गिरफ्तार लड़कियों में से दो पूर्व एयरहोस्टेस हैं जबकि एक भावी मॉडल है, जो एमबीए कर रही है। यह स्वामी चित्रकूट (यूपी) में 200 बिस्तरों का अस्पताल बनवा रहा है।
दक्षिणी जिला पुलिस उपायुक्त एचजीएस धालीवाल ने बताया कि साकेत थाना प्रभारी इंस्पेक्टर पंकज सिंह को सूचना मिली कि पीवीआर साकेत के पास कुछ लोग हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट चला रहे हैं। सूचना के आधार पर एसआई संजय शर्मा और दलीप कुमार को सादी वर्दी में उक्त स्थान पर ग्राहक के तौर पर भेजा गया। कुछ दूरी पर मुखबिर व पुलिस की बाकी की टीम भी तैनात हो गई।



मंगलवार, 2 मार्च 2010

भायली सीरखड़ी

 सीरखड़ी तूं म्‍हारी भायली है, सियाळे री सहेली है

लपट-झपट कर थारै सागे, सारी रात बितावौं

खाटा-मीठा सुपना देखों, किणने बात बतावों

मूतण री हाजत हो जावै, थर-थर कांपे काया

पाछा आय थांसूं मिलों तो, पाछा हो जावों न्‍याया

काती सूं फागण तक थारो, साथ घणो है आछो

निर्मोही आदत है म्‍हारी,‍ घिर नहीं जोउं पाछौ

तो ही तूं नहीं होवै रीसोणी, मिले प्रेम सूं पाछी

माइतों रा श्राद बीतियों पाछी आवै कातीरजाई ने इंगित करती मायड़ भाषा री आ कविता वैद्यराज सत्‍यनारायण जी व्‍यास सा म्‍हनै सुणाई। बै ब्‍लॉग और साइट रा मतलब तो को समझे नीं लेकिन म्‍हनै बियों कयो चावै जठे छाप। मायड़ में सहज सृजन री ई प्रवृत्ति रे साथै ब्‍लॉग पर आपांरी मायड़ री सेवा रे रंग चढ़ावणे रो प्रयास शुरू कर चुकियो हूं, बाकी लोगां ने भी घणे मान सूं न्‍यौतो दे रयो हूं। आवै जिका सृजनकार सिर माथै पर। एक बार सोची कि ई कविता रो हिन्‍दी अर्थ भी दूं। फेर सोचियो कि दूसरे लोगां ने पढ़ण दूं। कोई कैसी तो हिन्‍दी में भी अनुवाद लिख देसों। पण खांटी मारवाड़ी रो जिको आनन्‍द है बो अनुवाद में कोनी....

कोई भूल चूक होवे तो माफी चाउं

विद्वजणों री सलाह री उडीक रैसी

चमत्कारी है धानसा के महादेव

मोदरा। कहते है ईश्वर सभी प्राणियों का अपनी संतान की तरह पालन पोषण करता है और यदि कोई भी मनुष्य ईश्वर के प्रति आस्था रखता है तो ईश्वर भी उस पर कृपा दृष्टि बनाए रखते है। ऎसा ही उदाहरण है धानसा गांव के भक्त भाकरसिंह राठौड़ का। जिनकी जलंधरनाथजी के प्रति प्रगाढ़ भक्ति के कारण क्षेत्र में जलंधरनाथ मंदिर की स्थापना हो सकी। करीब 400 वर्ष पूर्व धानसा गांव में कृषक भाकरसिंह जालोर के सिरे मंदिर के जलंधरनाथ को अपना आराध्य मानते थे। वे प्रत्येक सोमवार को पैदल धानसा से जालोर के सिरे मंदिर में आराध्य की पूजार्चना के लिए जाते थे। लेकिन एक बार बारिश (हलोतरा) का मौसम था। भाकरसिंंह कृषि कार्यो में व्यस्त थे और इस कारण वे सोमवार को सिरे मंदिर जाना भूल गए। उनके घर से भाई सोमवार के दिन यह समझ कर भात (खाना)देरी से लाए कि भैया के सोमवार है और वे सिरे मंदिर गए होंगे। जब वे खेत पहुंचे तो भाकरसिंह उन्हें खेत में कार्य करते हुए दिखे और उन्होंने देखा कि भाकरसिंह ने काफी कार्य भी किया है। उन्होंने जब इस बारे में भाकरसिंह से पूछा कि क्या वे सिरे मंदिर नहीं गए। तब भाकरसिंह को पता लगा कि वे सिरे मंदिर जाना भूल गए है। वे उसी समय सभी कार्य छोड़कर सिरे मंदिर के लिए रवाना हो गए। रास्ते में उन्हें नाथ के वेश में स्वयं जलंधरनाथ मिले। उन्होंने भाकरसिंह से पूछा कि कहां जा रहे हो तो उन्होंने कहा कि वे सिरे मंदिर जलंधरनाथजी के दर्शन के लिए जा रहे है। इस पर उन्होंने जलंधरनाथ से उसी स्थान पर मिलवाने की बात कही तो भाकरसिंह को विश्वास नहीं हुआ। तब नाथ के वेश में जलंधरनाथ ने उन्हें एक खेजड़ी की सूखी लकड़ी दी और कहा कि यह लकड़ी सात दिन में हरी हो जाएगी। इस पर भाकरसिंह ने वह लकड़ी ले ली और उसे उसी स्थान पर खड़ा कर दिया। जब भाकरसिंह ने पीछे मूड़ कर देखा तो उन्हें उस स्थान पर पगलिए मिले जहां पर नाथ खड़ा था। तब उन्हें विश्वास हो गया कि वे स्वयं जलंधरनाथ ही थे। सातवें दिन खेजड़ी की लकड़ी पर कोंपल फूट गई। उसी स्थान पर एक पत्थर का बड़ा सा कुण्ड, नंदी और शिवलिंग भी मिला।उस कुण्ड में काफी समय तक सात गांवों के लिए सामूहिक प्रसादी भी होती थी, लेकिन कुछ विवाद हो जाने से यह प्रथा बंद हो गई। क्षेत्र समेत आसपास के गांवों के ग्रामीणों की इस मंदिर के प्रति आस्था देखते ही बनती है

कुर्सी का दंगल, पहलवानी में जुटे डॉक्टर

 राज्य के मेडिकल कॉलेजों के आला डॉक्टरों का दिल आजकल कामकाज में कम, प्रिंसिपल की कुर्सी के लिए चालू दंगल में ज्यादा लगा हुआ है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल की कुर्सी के दंगल में लोगों की दिलचस्पी सर्वाधिक है। दंगल में एक-दूसरे पर रंग डालने के लिए अधिकतर ने काला रंग चुना है। कुर्सी की दौड़ में जिसको जिससे खतरा है, वे एक-दूसरे पर काला रंग डालने की फिराक में हैं। यह काला रंग आरोप-प्रत्यारोप का है। इस बीच खबरियों से यह भी चर्चा आ रही है कि जो लोग इस कुर्सी पर बैठे हैं, कायदों से परे, उन्हीं का मन कुर्सी से भरता नजर नहीं आ रहा। यहां हम आपको सीधे लफ्जों में बता दें कि यह दंगल एसएमएस मेडिकल कॉलेज और उसकी सीमाओं से परे तीन और मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य के लिए जमा है। इनमें जयपुर, अजमेर, कोटा और जोधपुर मेडिकल कॉलेज अखाड़े बने हुए हैं। अजमेर और जोधपुर मेडिकल कॉलेज की सीटें प्राचार्य पदों के रिक्त स्थान को भरने के लिए कई दिन से विकल्प तलाश रही हैं तो कोटा मेडिकल कॉलेज में बैठे प्राचार्य की कुर्सी भी खाली होने वाली है। फिर भी सर्वाधिक दिलचस्पी राजधानी जयपुर की मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य की सीट को लेकर है। नियमानुसार 31 अगस्त को मौजूदा प्राचार्य का कार्यकाल पूरा हो रहा है। ऐसे में प्राचार्य पद की दौड़ के लिए इसी कॉलेज से 13 उम्मीदवार मैदान में कूद पड़े हैं। हम आपको बता दें कि इस सीट के लिए कई तिकड़म लगानी जरूरी रहती है। इतिहास के पन्नों को उठाकर देखा जाए तो सामने आता है कि पोस्ट के लिए बने नियमों के अलावा भी बातें हैं, जिनके मायने ज्यादा हैं। जैसे किस उम्मीदवार के पास किस नेताजी का नाम जुड़ा है..‘गांधीजी’ का आशीर्वाद जो ‘ऊपर’ तक दिखाना जरूरी है..वगैरह-वगैरह। अब यह दंगल मुहब्बत और जंग दोनों का है।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

इस बार छोटे मियां भी दिखाएंगे अपने जलवे

  •  जोधपुर. मारवाड़ में फागण की दस्तक के साथ ही होली के पारंपरिक गीतों का गायन शुरू हो गया है। जोधपुर में श्लील गाली गायन की खास परंपरा रही है जिसे कुछ लोग आगे बढ़ा रहे हैं तो कुछ इसका वर्षो से निर्वहन कर रहे हैं। इन दिनों भीतरी शहर की गलियों में श्लील गाली गायन की तैयारियां जोरों पर हैं। माईदास थानवी को श्लील गाली गायन का सरताज माना जाता है। उनकी गालियों का गजब का क्रेज है। हर साल वर्तमान परिवेश पर नई गालियां लिखी और गाई जाती हैं, लेकिन इस बार कई छोटे मियां भी इसमें पारंगत होकर जलवा दिखाने वाले हैं।

म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई.............

वचनाराम देवासी सामरानी
म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई ईंदानी ...........!राजस्थानी लोकगीत की यह पंक्तिया अब मात्र गुनगुनाते तक सिमित रह गई है!पनिहारी के सिर पर शोभित होने वाला मुकुट ईंदानी अब बीते जमाने की बात बन कर रह गई है!आजकल की युवतियो को ईंदानी की जानकारी ही नहीं है!क्योकि आज न तो पनघट है,और न ही पनिहारी तो फिर ईंदानी किस कम की!विज्ञानं के युग में घर-घर में नल व हैंडपंप लगे होने के कारण घर से बहार कोई पानी भरने की परम्परा ही खत्म हो गई है!जिस जमाने ईंदानी का रिवाज था उस समय बेटी की दहेज में अवश्य दी जाती है!राजस्थान के मारवाड़ अंचल में पानी पानी से भरे घड़े को सिर पर उठाने के लिए ईंदानी बढिया उपकरण हुआ करती थी!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

30 मिनट में खाने का करें काम तमाम


 कभी  काम तमा स्कॉलरशिप तो कभी मार्कशीट की सेहत सुधारने के लिए पढ़ाई के मोर्चे पर प्रतियोगिता में जुटे रहने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रों की पेटपूजा भी अब प्रतियोगिता बन गई है। जी हां, जानकर हैरानी तो होगी लेकिन विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर की चर्चित बैम्बू कैंटीन में अब लंच करना भी प्रतियोगिता से कम नहीं रह गया है। दोपहर साढ़े बारह बजे से शुरू होने वाली यह प्रतियोगिता ढाई बजे तक चलती है और हर छात्र को सख्त हिदायत है कि वह आधे घंटे के भीतर न सिर्फ खाना लेगा बल्कि उसे खत्म क र सीट खाली करेगा।विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कैंपस में यहां-वहां नोटिस लगाकर छात्रों को सूचित किया जा रहा है कि अब बैम्बू कैंटीन में पेटपूजा के लिए होने वाली प्रतियोगिता के नए नियम क्या हैं। प्रशासन के मुताबिक अब लंच दोपहर 12:30 से 2:30 के बीच चार चरणों में होगा और एक बार में पचास से ज्यादा छात्रों को कैंटीन में एंट्री नहीं दी जाएगी। खास बात तो यह है कि हर छात्र को अपना खाना 30 मिनट के भीतर ही खत्म करना होगा। छात्रों की बात करें तो उनका कहना है कि आज जब हर मोर्चे पर कम्पीटिशन का सामना करना पड़ रहा है।प्रशासन के इस कदम से अब खाना भी चैन से खाना दूभर हो गया है। छात्रों ने बताया कि इस बात को लेकर जब उन्होंने कैंटीन संचालकों से शिकायत की तो उनका कहना था कि निर्धारित समय से पहले या बाद में आएं। लेकिन इस बात का उनके पास कोई जवाब न था कि पहले खाना तैयार नहीं हुआ और बाद में बचा नहीं तो क्या होगा? डिप्टी डीन छात्र कल्याण (दक्षिणी परिसर) डॉ. दिनेश वाष्ण्रेय ने बताया कि प्रशासन को यह कदम छात्रों के रवैये के मद्देनजर उठाना पड़ रहा है।छात्र लंबे समय तक कैंटीन में ही डटे रहते हैं चार लोगों की टेबल को दो-दो छात्र घेरे रखते हैं। ऐसे में जो छात्र खाना खाने के उद्देश्य से कैं टीन पहुंचते हैं उन्हें परेशानी होती है। डॉ. वाष्ण्रेय ने बताया कि कैंटीन में भीड़ बढ़ने का एक और कारण अरावली व सारामती हॉस्टल के छात्रों का भी यहां पहुंचना है। कारण हॉस्टल मेस का बंद होना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कैंपस में बढ़ी भीड़ को देखते हुए यह व्यवस्था कुछ समय के लिए की गई है और जैसे ही स्थिति सुधरेगी और कैंटीन में पहुंचने वाले टाइमपास करना छोड़ खाना खाकर जगह छोड़ने लगेंगे तो समय की पाबंदी भी खत्म कर दी जाएगी।

समझौता एक्सप्रेस की सुरक्षा रामभरोसे

नई दिल्ली. भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली अटारी एक्सप्रेस (समझौता एक्सप्रेस) और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है। ट्रेन के साथ ही लाखों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) के मात्र 212 जवानों के हवाले है। मालूम हो कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रोजाना चार से पांच लाख यात्री यात्रा करते हैं। यह हालत उस समय है, जब अटारी एक्सप्रेस हर पल आतंकियों के निशाने पर रहती है। कुछ दिन पूर्व आतंकियों ने अटारी स्टेशन को ही उड़ाने की धमकी दी थी। इसके मद्देनजर केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने अटारी स्टेशन का दौरा भी किया। हालांकि सरकार का दावा है कि स्टेशन और यात्रियों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की गई है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। रेलवे के एक आला अधिकारी ने बताया कि आरपीएफ के 212 जवानों में से 30-40 जवान अटारी एक्सप्रेस के साथ पाकिस्तान तक जाते हैं। ट्रेन में अमूमन ढाई से तीन सौ यात्री सवार रहते हैं। ऐसे में जवानों पर अत्यधिक दबाव रहता है। यात्रियों के सामानों की जांच के लिए तीन स्कैनर मशीन हैं, लेकिन काम केवल एक ही करती है। दो स्कैनरों को तो अब तक स्थापित भी नहीं किया गया है। दोनों स्कैनर मशीन दो वर्ष से अधिक समय से रेलवे के गोदाम में धूल फांक रही हैं। सामानों की जांच शाम छह से रात के नौ बजे तक की जाती है। ऐसे में एक मशीन से सामानों की सही ढंग से जांच नहीं हो पाती है। उन्होंने बताया कि यात्री पहले बुकिंग के सामान अपने साथ ही ले जाते थे, लेकिन अब एसएलआर के माध्यम से जाता है। यानी बुकिंग के सामानों की अलग से जांच की जाती है। इसके अलावा सामानों की बुकिंग पहले से नहीं की जाती है। यात्रा के दिन ही बुकिंग की जाती है, जिसके चलते भी जांच में देरी हो जाती है। उन्होंने बताया कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के 18 प्लेटफार्मो की सुरक्षा और जांच भी आरपीएफ के इन्हीं जवानों को करनी होती है। जवानों की भारी कमी के बारे में रेल मंत्रालय को कई बार सूचित किया जा चुका है। लेकिन, आतंकी घटनाओं में बढ़ोतरी के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है। गौरतलब है कि 18 फरवरी 2007 को आतंकियों ने अटारी एक्सप्रेस को निशाने पर लिया था। जिसमें कई यात्रियों की जान चली गई!

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अखियां श्याम दरस की प्यासी..

 खाटूश्यामजी. दूर दराज से कई किमी का सफर, लंबी पदयात्रा और घंटों कतार, भक्त ये सब कुछ बस बाबा की एक झलक पाने के लिए कर रहे हैं। इतने जतन के बाद लखधणी दातार के दरबार में दर्शन के लिए जो एक मिनट का समय मिल रहा है वह एक साथ 350 श्रद्धालुओं की झोली खुशियों से भर रहा है। दशमी के दिन तक बाबा के दरबार में करीब छह लाख श्रद्धालुओं की हाजरी लग चुकी है। बाबा के दर्शनों की आस, देश कोने-कोने से श्याम भक्तों को खींच ला रही है। बाबा का मुख्य मेला गुरुवार को भरेगा। एकादशी के मौके पर भरने वाले मेले में करीब चार लाख से अधिक श्रद्धालु जुटने की उम्मीद है। हर तरफ आस्था, भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है। खाटूधाम की धर्मशालाआंे में भी श्याम के भजन कीर्तनों का दौर चल रहा है। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने के कारण बुधवार को प्रशासन को रींगस-खाटूश्यामजी मार्ग को वनवे में तब्दील करना पड़ा है। श्रद्धालुओं की भीड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रींगस से खाटूश्यामजी 20 मिनट मे पहुंचने वाले वाहन अब तीन घंटे मे खाटू पहुंच रहे हैं। अलग-अलग टोलियों और निशानों के साथ भक्त बाबा के दरबार में पहुंच रहे हैं।





गुजरात में बन रहा है अनोखा वृक्ष मंदिर

 अहमदाबाद. पर्यावरणीय संतुलन को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। ग्लोबल वॉर्मिग की समस्या से निपटने के लिए चिंतन, मनन व मंथन चल रहा है। इस बीच गुजरात के विरमगाम के भाजपा विधायक कमाभाई राठौड ने एक अनूठा प्रयास आरंभ किया है। वे अपने गांव वडगाम में वृक्ष मंदिर बनवा रहे हैं। इस अनूठे मंदिर में भगवान शंकर के साथ ही वृक्ष देव के रूप में तुलसी की पूजा की जाएगी।उधर, मंदिर में दर्शन करने आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को कहीं न कहीं एक वृक्ष रोपना पड़ेगा। हाल ही में इस मंदिर का शिलान्यास किया गया था। इस अनूठे मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ कर दिया गया है और आगामी दो महीने में इसके बनकर तैयार होने की उम्मीद है। विरमगाम के भाजपा विधायक कमाभाई अपनी जमीन पर वृक्ष मंदिर बनवा रहे हैं। मंदिर में पौध उपलब्ध करवाने के लिए वन विभाग ने अनुमति

रेल बजट से खुश नहीं मेवाड़

उदयपुर. रेल बजट की घोषणा के बाद मेवाड़ की दशा मावली—बड़ी सादड़ी रेल खंड की भांति दिखाई दे रही है जिसका धणी—धोरी कोई नहीं है। मेन लाइन से बहुत दूर व विकास की धारा से भटके हुए मेवाड़ को बजट में रेल मंत्री ममता बैनर्जी ने पूरी तरह से निराश किया है। कांग्रेस के नेताओं ने बजट को संतुलित बताया और भाजपा ने पूरी तरह निराशजनक। रेलों में यात्री किराया व माल भाड़ा न बढ़ाना राहत की बात है मगर विकास की दृष्टि से मेवाड़ ठगा सा रह गया है। उदयपुर से कम से कम दो नई गाड़ियां चलने, बांद्रा, इंदौर व सियालदाह एक्सप्रेस के फेरे बढ़ने, चेटक एक्सप्रेस का मार्ग बदलने व अजमेर इंटरसिटी को जयपुर तक चलाने की बजट में घोषणा की उम्मीद थी।

कैसी होगी तेरी रात परदेस में

कैसी होगी तेरी रात परदेस में,

चाँद पूछेगा हालात परदेस में।

ख्व़ाब बनकर निगाहों में आ जाएँगे,

हम करेंगे, मुलाकाल परदेस में।

बादलों से कहेंगे कि कर दे वहाँ,

आँसुओं की ये बरसात परदेस में।

रंग चेहरे पे लब पे हँसी दिल को चैन,

कौन देगा ये सौग़ात परदेस में।

तुमको महसूस होती नहीं जो यहाँ,

याद आएगी वो बात परदेस में।

हर क़दम पे नज़र तुमको आएँगे हम,

देखना ये करामात परदेस में।

ज़ेहन की वादियों में सजालो इन्हें,

काम आएँगे जज्ब़ात परदेस में।

आपसे जब सामना होने लगा,

ज़िन्दगी में क्या से क्या होने लगा।

चैन मिलता है तड़पने से हमें,

दर्द ही दिल की दवा होने लगा।

ज़िन्दगी की राह मुश्किल हो गई,

हर क़दम पर हादसा होने लगा।

दोस्तों से दोस्ती की बात पर,

फ़ासला दर फ़ासला होने लगा।

जो ग़जल में शेर बनकर के रहा,

काफ़ियों से वो ज़ुदा होने लगा।

जैसे हो तस्वीर इक दीवार पर,

आदमी अब क्या से क्या होने लगा।

ये तुम्हारी याद है या ज़ख्म है,

दर्द पहले से सिवा होने लगा।

मोतियों की तरह चेहरा तेरा सच्चा लगता,

हमको दुनिया में कोई और न अच्छा लगता।

तेरे माथे पे जो बिंदिया है, सलामत रखना,

ये अँधेरों में कोई चाँद चमकता लगता।

किस तरह आँख मिलायें, कभी ये तो बतला,

तेरी पलकों पे सदा शर्म का पहरा लगता।

मैंने माँगा था इबादत में, इन्हीं लमहों को,

साथ में तेरे मुझे वक्त भी ठहरा लगता।

तेरे बिन ये पहला-दिन,

सूना-सूना निकला दिन।

सूरज किरनें धूप वही,

फिर भी बदला बदला दिन।

तेरे साये, ढूंढ़ रहा है,

कैसा है ये पगला दिन।

तनहाई के सन्नाटों में,

घूमा झुंझला-झुंझला दिन।

शाम तलक तड़पा यादों में,

फिर मुश्किल से सम्भला दिन।

ढूंढ़ता है आदमी, सदियों से दुनिया, में सुकून।

धूप में साया मिले, कमल जाये सहरा में सुकून।

छटपटाती है किनारों, पर मिलन की आस में

हर लहर पा जाती है, जाकर के दरिया में सुकून।

बेक़रारी है कभी, पूरे समन्दर की तरह,

और कभी मिल जाता है बस, एक क़तरे में सुकून।

ज़िन्दगी को इससे ज्य़ादा और क्या कुछ चाहिए?

लबस हो इक प्यार का, और उसके लमहात में सुकून।

हर सवाली चेहरे पे लिख़ी इबारत देखिए,

चैन है कि न आँखों में, और कौन से दिल में सुकून।

वो खुदा से कम नहीं लगता है, मुझको दोस्तो,

मेरे ख़ातिर माँगता है जो दुआओं में सुकून।

ये उसी दामन की भीनी खुशबू का एहसास है,

जो मुझे महसूस होता है हवाओं में सुकून।



हरता-फरता चोट ,उड़ाग्या मूंडा रा रंग

हार्या केड़े देखजो , कठे-कठे ही खोट ।

कतरा जिगरी कर गया ,हरता-फरता चोट ।।

हरता-फरता चोट ,उड़ाग्या मूंडा रा रंग ।

हाल-चाल बेहाल , कदी न कर ऐसो संग ।।

के ’वाणी’ कविराज, जद दारू-पाणी नेड़े ।

पी-पी के जो जाय , आय कुण हार्या केड़े ।।

ममता ने किया सबको खुश

 नई दिल्ली। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर लोकलुभावन बजट पेश किया। पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यात्री किराए व माल भाडे में कोई बढोतरी नहीं की गई है। उल्टा खाद्य पदार्थो व केरोसीन के मालभाडे में सौ रूपए की कमी भी की गई है। ममता ने रेलवे को मानवीय चेहरा देने की कोशिश के तहत एक बडा कदम उठाते हुए कैंसर रोगियों को स्लीपर व एसी थ्री में मुफ्त में यात्रा की सुविधा मुहैया कराई है।ममता ने कहा कि पांच साल में पूरे देश को रेल से जोड दिया जाएगा। आधारभूत ढांचे पर वर्ष ध्यान देते हुए एक हजार किमी तक का रेलवे ट्रेक बनेगा। साथ ही 94 स्टेशनों को अपग्र्रेड को किया जाएगा। कई स्टेशनों का नाम महापुरूषों पर रखा जाएगा। 54 नई ट्रेनें चलाई जाएगी। और 10 दूरतों ट्रेनें चलेंगी। इनमें जयपुर-मुंबई भी एक है। यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखते हुए ई टिकट सरचार्ज 40 रूपए से घटाकर 20 रूपए किया जाएगा।
















अधूरी रह गई दर्शन की आस

 नीमकाथाना/नारनौल. हमउम्र कमला देवी, कबूल देवी और धन्नी देवी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस श्याम बाबा के दरबार में वे ध्वजा चढ़ाने जा रही हैं, वे ही इतनी जल्दी उनको अपने पास बुला लेंगे। कमला व धन्नी तो मन्नत पूरी होने पर श्याम बाबा की ध्वजा का जोड़ा पूरा करने जा रही थीं, जबकि कबूल पहली बार उनके साथ श्याम बाबा के दर्शनों की अभिलाषी थी। धन्नी देवी ने हृदय रोग से पीड़ित बेटी सुमन के स्वस्थ होने की कामना की थी। श्यामबाबा ने कामना पूरी की तो मां-बेटी दोनों साथ ध्वजा चढ़ाने जा रही थीं और हादसे में दोनों चल बसीं। कमला ने अपने भाई की जेल से रिहा होने की मन्नत मांगी थी। बाबा ने कामना पूरी कर दी थी और वह जोड़ा पूरा करने के लिए ध्वजा लेकर जा रही थी। कमला व धन्नी के बाबा के दरबार में जाने की खबर पाकर कबूल ने भी उनके साथ जाने का मन बना लिया। वह पहली बार श्याम दर्शन को जा रही थी, लेकिन वह इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी। गांव के लोगों ने बताया कि तीनों का आपस में गहरा मेलमिलाप था। कमला व कबूल तो रिश्ते में जेठानी-देवरानी थीं। वैसे तीनों एक ही कुनबे की सदस्य थीं। खाटू श्याम जाते समय कमला के साथ उसकी पोती छोटी व दोहिता देवेंद्र भी था। उनका जत्था 21 फरवरी को सुबह गांव से रवाना हुआ था। हादसे की सूचना मिलते ही सभी लोग एकत्रित हो गए और बिना ध्वजा चढ़ाए ही वापस लौट आए।
मातम में बदला भक्ति का माहौल
विश्राम कैंप में श्रद्धालु भक्ति के रंग में सराबोर थे। चंद पल में ही काल बनकर आई ट्रेन ने पांच श्रद्धालुओं की जान ले ली। विश्राम कैंप का माहौल मातम में तब्दील हो गया।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

चल रही है पत्नी पीड़ित संघ की भूख हड़ताल


जोधपुर. शादी के बाद वह मेरे पिताजी के नाम की जायदाद को खुद के नाम करवाने की जिद करने लगी। मैंने खूब समझाया लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही। मैं अपने माता-पिता से अलग नहीं होना चाहता था। यह बात उसे मंजूर नहीं हुई। उसकी नाजायज मांग न मानने पर तीन दिन जेल में बिताने पड़े।ऐसी बीवी से तो कुंवारा ही भला था। नई सड़क चौराहे पर पत्नी पीड़ित पति संघ के तत्वावधान में रविवार से शुरू हुई क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे लोगों से भास्कर ने बातचीत की तो उनके अंतस से वेदना के ऐसे ही स्वर फूटे। इस दौरान कुछ लोग तो अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते सुबक पड़े।सरस्वती नगर निवासी मुकेश अग्रवाल की शादी 11 जुलाई 07 को पुंगलपाड़ा निवासी मोहनलाल जालानी की पुत्री अंजू के साथ हुई थी। छह महीने तो खुशी-खुशी गुजरे लेकिन बाद में पत्नी की एक मांग ने मुकेश के परिवार को मुश्किल में डाल दिया। मुकेश ने बताया कि उसकी पत्नी ने पिताजी का मकान खुद के नाम करवाने की जिद की।इसी बात को लेकर मार्च 08 को दोनों में झगड़ा हो गया। बात बढ़ते बढ़ते इस हद तक पहुंच गई कि अप्रैल 08 में पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना व घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवा दिया। उसे तीन दिन जेल में बिताने पड़ गए। तब से अब तक वह माता-पिता से अलग किराए के मकान में रह रहा है ताकि उन पर तो आंच न आए।अब वह पत्नी से तलाक का इच्छुक है। विद्यानगर में रहने वाली विजयलक्ष्मी की कहानी भी कम कारुणिक नहीं है। उसने अपनी बहन के बेटे वीरेंद्र कुमार शर्मा को अपने बेटे की तरह पाला-पोसा और वर्ष 2004 में उसकी शादी नीमच में रहने वाली कल्पना से कर दी। कुछ साल तक सब कुछ ठीक-ठाक रहा, लेकिन आठ-दस माह पूर्व पति-पत्नी में झगड़ा हो गया।मौसी का मकान खुद के नाम पर करने की बात को लेकर वीरेंद्र की अपनी पत्नी से अनबन हो गई। उसे तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ा, उसकी मौंसी व मौंसा विनोद कुमार को भी पुलिस ने बेजा तंग किया। अब न्यायालय में मुकदमा चल रहा है। वीरेंद्र की मौंसी अब कल्पना के साथ कोई संबंध रखना नहीं चाहती।मेहरों का चौक नया बास में रहने वाले राकेश मेहरा की शादी 28 फरवरी 09 को अजमेर के वैशाली नगर निवासी राजेंद्र मेहरा की पुत्री कोमल के साथ हुई थी। यहां पर वधू पक्ष ने दहेज का सामान बाद में भेजने की बात कहते हुए बारात को रवाना कर दिया। वह सामान तो खैर क्या आना था, तीन जून को पीहर गई कल्पना भी लौट कर नहीं आई।इतने पर ही बात खत्म नहीं हुई। एक दिन अचानक ही अजमेर से आई पुलिस राकेश व उसके मां-बाप को पकड़कर ले गई। उन पर दहेज प्रताड़ना व घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवाया गया। तब से राकेश का पूरा परिवार परेशान है। हालांकि उसके पिता थानचंद मेहरा अब भी चाहते हैं कि उनकी पुत्रवधू घर लौट आए।

फाल्गुन में गिरी सावन-सी फुहार

जब लोग जागे तो आसमान की ओर निहारते उन्हें लगा नहीं कि ये फाल्गुन का महीना है। दिनभर गिरी फुहारे और बूंदाबांदी ने सावन की याद दिला ताजा कर दी। मौसम का मिजाज बदलते ही लोगों की दिनचर्या भी बदल गई। कुछ भीगने से बचते रहे तो कुछ सर्दी में भी फुहारों का आनंद लेते देखे गए। सुबह से ही बादलों ने पूरा आसमान ढ़क लिया था। सुबह लोग तैयार होकर कार्यालय की ओर रवाना होने की तैयारी कर रहे थे कि करीब साढ़े नौ बजे फुहारें गिरनी शुरू हो गई और उसके बाद दिनभर टिप-टिप का दौर जारी रहा। हालांकि सुबह नौ बजे के करीब कुछ देर के लिए धूप निकली। धूप निकलते ही लोग तैयार होकर कार्यालय की ओर रवाना होने ही वाले थे कि फिर से बूंदाबांदी शुरू हो गई। उसके बाद दिन में रह-रहकर फुहारें पड़ती रही। दोपहर तक इतनी बारिश हो चुकी थी कि सड़कें गीली हो गई। लोग बूंदाबांदी के कारण कहीं निकल नहीं पा रहे थे क्योंकि कुछ देर ठहरने के बाद फिर से बूंदाबांदी शुरू हो जाती। 12 बजे के करीब इतने बादल इतने घिर गए मानो तेज बारिश होगी मगर कुछ देर ही बूंदाबांदी हुई। तीन बजे के करीब फिर से सूर्य बादलों की ओट से निकलने की कोशिश करता रहा मगर उसका प्रयास सफल नहीं हो सका। स्कूल की छुट्टी होते ही अभिभावक छाता लेकर स्कूल पहुंच गए ताकि बच्चे भीगक र घर नहीं आएं। जिन बच्चों के अभिभावक ऐसा नहीं कर पाए उनके बच्चे भीगते हुए घर पहुंचे। मौसम का असर बाजार पर भी पड़ा। बूंदाबांदी के कारण लोग घर से नहीं निकले जिसके कारण बाजार में दिनभर रौनक फीकी रही। सड़कों पर भी भीड़-भाड़ कम रही। जैसे ही कुछ देर के लिए बूंदाबांदी बंद होती लोग कुछ काम निबटाने के लिए निकल जाते मगर बीच में फुहारें पड़ते ही सुरक्षित जगह ठहर जाते। लोग इससे परेशान भी हुए क्योंकि इससे उनकी दिनचर्या प्रभावित हुई। दूसरी ओर मौसम का मिजाज बदलते ही समौसे-कचौड़ी और चाय की थडिय़ों पर भीड़ लग गई। दिनभर में 2.5 मिलीटर बारिश दर्ज की गई।इसलिए बदला मौसम का मिजाजमौसम विभाग ने एक दिन पहले ही प्रदेश में मौसम के परिवर्तन के संकेत दे दिए थे। बीते 24 घंटे से पश्चिमी विक्षोभ का असर प्रदेश पर बना हुआ है इसी कारण रविवार को तापमान बढ़ गया था और सोमवार को बादल और बूंदाबांदी का सामना करना पड़ा। जयपुर मौसम विभाग के मुताबिक आगामी दो दिनों तक बादल छाए रहने और बूंदाबांदी की संभावना है। इसके बाद मौसम सामान्य होगा।

सरस्वती बता रही है मेवाड़ का रिश्ता


उदयपुर. यदि हरियाणा के सैमाण व फरमाणा में वैदिक सरस्वती की प्रधान सहायक नदी दृषद्वती के प्रवाह क्षेत्र में हुई खुदाई में मिले अवशेषों की जुबानी जाने तो यह स्वीकारना होगा कि वैदिक काल में मेवाड़ का सरस्वती सिंधु निवासियों के साथ अच्छे ताल्लुकात थे।
यह सभ्यता का वह सांस्कृतिक दौर था जब हड़प्पावासियों की नगर नियोजन विधि और मेवाड़ की ग्राम्य निवेश विधि को देशवासी न केवल जान रहे थे बल्कि उसका अनुसरण भी करने लगे थे। डेकन कॉलेज, पुणो के पुरातत्वविद् प्रो. वसंत शिंदे ने यह खुलासा दृषद्वती नदी के किनारे पर बड़े क्षेत्र में उत्खनन के बाद किया।
हरियाणा के रोहतक के निकट बसे फरमाना के आसपास बड़े क्षेत्र में उत्खनन शुरू किया गया है। यह उत्खखन इन दिनों जारी है। जो अवशेष मिले हैं, वे बताते हैं कि यह उस काल में कस्बे की तरह आबाद था।
वहां करीब 3500 ईसा पूर्व कृषि के साथ ही व्यापारिक गतिविधियां अस्तित्व में थीं और इन गतिविधियों में मेवाड़ भी अपना योगदान दे रहा था। मेवाड़ की घग्घर नदी इसी सरस्वती, दृषद्वती का पुनरूप मानी जाती है।
क्या मिली समानताएं : डॉ. शिंदे के अनुसार उदयपुर संभाग में बनास बेसिन में गिलूंड (राजसमंद), बालाथल (उदयपुर) से जो बर्तन मिले हैं, वैसे ही बर्तन फरमाना में मिले हैं। ऐसे बर्तनों को रिजर्वस्लिप पोट्री के रूप में जाना गया है।
ये बर्तन मेवाड़ से ही वहां पहुंचे होंगे, इस बात की प्रबल संभावना है क्योंकि इसी क्षेत्र से ग्रेनाइट भी वहां पहुंचा था और वहां उसका उपयोग मोती बनाने के किया गया। वहां मोती निर्माण की कार्यशाला का भी पता चला है। इसके लिए कच्चे माल रूप में गार्नेट मेवाड़ के आसपास से ही वहां पहुंचा था।
उस समय दृषद्वती के आसपास के क्षेत्र में अनाज की भरपूर पैदावार थी और संभवत: वहां से अनाज मेवाड़ आता था। गिलूंड में अनाज के बड़े बड़े गोदाम होने की पुष्टि हो चुकी है। मेवाड़ और मेवाड़ के अन्य हिस्सों से तांबा भी वहां पहुंचता था। गुजरात से शंख और सिंध क्षेत्र से नीला पत्थर वहां पहुंचता था। बहुत संभव है कि यह व्यापार पशुओं पर माल का परिवहन करने वालों के मार्फत ही होता था।
क्या सीखा परस्पर : शिंदे का मानना है कि हड़प्पा के साथ मेवाड़ के रिश्तों पर पुनर्विचार की संभावना गिलूंड की खुदाई के साथ ही बनी। मेवाड़ में लगभग उसी काल में ग्राम निवेश का जोर था जबकि हड़प्पावासी नगर निवेश कर रहे थे। बाद में उन्होंने जहां भी बस्तियां बसाई, ग्राम निवेश किया और इसकी प्रेरणा मेवाड़ रहा।
दोनों ही क्षेत्रों में स्थानीय लोग ही थे किंतु वे एक दूसरे की सभ्यता व संस्कृति से सीख रहे थे। ईसा पूर्व 1500 के आसपास जबकि अकाल या अन्य कारणों से सरस्वती प्रवाह क्षेत्र से लोगों का पलायन हुआ तो मेवाड़ सहित पुष्कर-मेरवाड़ा, लूणी-मारवाड़, सौराष्ट्र, उत्तरी गुजरात में लोगों ने आश्रय लिया। बहुत संभव है ये सारस्वत कहे जाने लगे।
कहां है जिक्र : सप्तसैंधव प्रदेश व सरस्वती नदी का जिक्र ऋग्वेद (7, 95, 2; 2, 14, 6; 7, 95, 1; 6, 21, 2 से 9) और महाभारत (95, 24) में आया है। ब्रrावैवर्तपुराण को सूत ने दृषदृती के तट पर ही ऋषियों को सुनाया था।
इसी नदी के किनारे विद्या व वाक् की परंपरा रही और अन्य क्षेत्रों से सांस्कृतिक संबंधों, व्यापारिक गतिविधियों के चलते मेवाड़, सौराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और वर्तमान पाकिस्तान में राजनीति के केंद्रों के विकास के साथ ही प्रशासन, जनतंत्र (जनपद), वाणिज्य, कृषि पद्धतियों का विकास हुआ।

दुल्हन नहीं, शव पहुंचा ससुराल

उदयपुर. राजसमंद के कोठारिया से तीन दिन पहले सात फेरे लेकर ससुराल झालावाड़ रवाना हुई दुल्हन कल्पना मावली के पास सड़क हादसे में जख्मी हुई थी। तीन दिन अस्पताल में बेसुध सांसें लेकर नववधू ने शुक्रवार तड़के साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली।
रो रोकर बेहाल परिजनों ने ससुराल वालों की इच्छा का सम्मान रखते हुए अपनी बिटिया के निर्जीव शरीर को दुबारा विदा किया लेकिन अबकी बार सुखी जीवन के आशीर्वाद की बजाय प्रार्थना उसके मोक्ष के लिए थी। एमबी अस्पताल में तीन दिन तक कल्पना जीवन मृत्यु के बीच झूलती रही, चिकित्सकों ने पूरी कोशिश की लेकिन दवाओं और दुआओं के बावजूद वार्ड से लाल जोड़े में सजी धजी दुल्हन का शव ही बाहर आया। मृतका के हाथों की मेहंदी का रंग उतना ही गाढ़ा था और कांकण डोरे तक जस के तस बंधे हुए थे।
नव ब्याहता को जड़ देखकर भावनाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मुर्दाघर के बाहर परिजन पड़ोसी, ससुराल वाले तो रोए ही, यहां तक अस्पताल कर्मचारियों की भी आंखें भर आईं। रूदन और क्रंदन से गमगीन माहौल भारी हो गया। हादसे में घायल दूल्हे अभिनव सिंह सोनगरा की हालत भी खराब थी। दाम्पत्य जीवन के पहले कदम पर ही अपनी जीवन साथी से बिछोह पर मानों दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। ढांढस देने वालों के पास भी शब्द नहीं थे तो वे उसे क्या समझाते। सभी बस यही कहते सुनते रहे, कि दुल्हन अपने ससुराल की देहलीज भी ना चढ़ सकी।

होली पर नहीं होगा पूरी रात धमाल

भास्कर न्यूज & पालीहर साल रंगों के पर्व होली पर पूरी रात होने वाली धमाल इस बार नहीं हो सकती है। तिथियों में घटत—बढ़त व अधिक मास के कारण करीब 19 साल बाद फरवरी में आ रही होली के साथ ही पंचांग में इस बार होलिका दहन का मुर्हूत भी सांझ ढलते ही आ रहा है।रंगों की बरसात,फाल्गुनी माहौल, हंसी—ठिठोली के स्वर तथा मस्ती भरे अंदाज के लिए प्रख्यात होली के पर्व पर धमाल दो दिन पहले ही जिलेभर में शुरुआत हो जाती है। जो होलिका दहन की पूरी रात तथा दूसरे दिन धुलंडी को तो परवान पर पहुंच जाती है। पिछले कुछेक सालों को छोड़े तो हर बार होलिका दहन का मुहूर्त पंचांग के अनुसार रात में ही आता है, इसके चलते पूरी रात को होली की धमचक रहती है। युवा वर्ग तो होली की मस्ती में इस कदर डूबा रहता है ,कि उनको पता ही नहीं चलता कि कब सुबह हो जाती है। पंडित महेंद्र रावल के अनुसार होलाष्टक रविवार को शाम के बाद लग गया है। इसके साथ ही 28 फरवरी रात तक कोई शुभ कार्य नहीं होगा। पूर्णिमा को शाम तक प्रदोषकाल भी रहेगा। होलिका दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 28 फरवरी को शाम 6.30 बजे से रात 9.07 बजे तक रहेगा। मगर मुहूर्त की शुरुआत में ही दहन अधिक श्रेष्ठ है। इस साल दो वैशाख : भगवान की भक्ति के लिए इस बार दो वैशाख माह आ रहे है। तीन साल बाद आने वाले अधिक मास में पहले वर्ष 2007 में जेठ माह आया था। अधिक मास की शुरूआत 15 अप्रैल से शुरू होगी,जो 14 मई तक रहेगा। अधिक मास में भजन कीर्तन ही करना चाहिए। इस दौरान मांगलिक कार्यो से बचना चाहिए। पंडित दिनेश दिनकर के अनुसार धर्मग्रंथों में यह मास केवल भगवान की भक्ति के लिए होता है। निष्काम भाव से केवल धर्म कार्य,भागवत कथा,श्रवण,तीर्थ सत्संग करने से ही फल प्राप्त होता है। इस मास में सूर्य भगवान को भी नियमित रूप से अध्र्य देने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।19 साल का अजब संयोगफरवरी माह में बरसों बाद होली का संयोग करीब 19 साल बाद आ रहा है। इससे पहले वर्ष 1991 में भी फरवरी माह में ही होलिका दहन हुआ था। अब आगे भी वर्ष 1929 में ही फरवरी माह में हाली आएगी। यानि 19 साल बाद फिर से होली फरवरी में आएगी। जानकारों का कहना है कि तिथियों में क्षय के कारण ऐसा संयोग हो रहा है।

विदेशी बाला के मन भाए ‘बाबा’

विदेशी बाला के मन भाए ‘बाबा’

जोधपुर. योग सिखाने वाले बाबा विदेशी युवती को इतने पसंद आए कि दोनों विवाह के बंधन में बंध गए। दोनों सोमवार को विवाह का पंजीकरण करवाने नगर निगम पहुंचे तो वहां इस जोड़े को देखने मजमा लग गया। बाबा इस युवती के देश जाकर योग का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं। यह बात और है कि कानूनी पेचिदगियों की वजह से उनका विवाह पंजीयन प्रमाण-पत्र नहीं बन सका। उनसे कुछ कागज और मांगे गए हैं। बड़लेश्वर महादेव मंदिर मसूरिया के बाबा मारुति गिरी स्विट्जरलैंड की तानिया उर्फ चन्द्रा के साथ नगर निगम पहुंचे तो वहां हर किसी की नजरें उनको ही देखने लगीं। पचास साल के बाबा और तैतीस साल की विदेशी युवती हाथों में हाथ डाल विवाह पंजीयन शाखा पहुंचे। प्रभारी कुशल जैन को बताया कि उन्होंने 20 जनवरी को आर्य समाज में शादी रचाई है। अब मैरिज सर्टिफिकेट बनवाना चाहते है। उन्होंने शपथ-पत्र और आर्य समाज का मैरिज सर्टिफिकेट पेश किया तो जैन ने उन्हें निगम आयुक्त के पास भेज दिया। आयुक्त ने उनके दस्तावेजों की जांच की। चूंकि मामला विदेशी महिला का देशी बाबा के संग शादी का था, इसलिए उन्होंने कुछ और दस्तावेज मांगे। इस जोड़े ने कहा कि उन्हें स्विट्जरलैंड जाना है। बाबा का पासपोर्ट बनाने के लिए भी एप्लाई किया है। इसके बाद दोनों इंटेलीजेंस विभाग में कानूनी कार्रवाई करने चले गए। दो साल पूर्व मारुति गिरी व तानिया द्वारका में मिले थे। वहां बाबा योग का प्रशिक्षण दे रहे थे। संस्कृति जानने आई थीञ्चयहां की संस्कृति जानने और योग सीखने आई थी। बाबा अच्छे लगे, प्रेम कर बैठी। इनसे हिन्दी व संस्कृत भी सीखी। अब हम योग का प्रचार—प्रसार करना चाहते हैं।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कृषकों का भ्रमण २5 से

बाड़मेर से जयपुर के बीच वोल्वो बस चलेगी
जिला मुख्यालय से राजधानी जयपुर के मध्य शीघ्र ही वोल्वो बस का संचालन किया जाएगा। यह घोषणा यातायात मंत्री बृज किशोर शर्मा ने गुरुवार को की। शर्मा ने बताया कि बाड़मेर में तेल तथा लिग्नाइट के अन्वेषण के पश्चात अति आधुनिक यातायात की सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता है। इसके मद्देनजर शीघ्र ही एक वोल्वो बस चलाई जाएगी। उन्होंने बताया कि बाड़मेर तथा जयपुर के मध्य वर्तमान में भी वातानुकुलित वाहनों का संचालन किया जा रहा

दो साल बाद भी शुरू नहीं हुआ बीएसएनएल टॉवर

दो साल बाद भी शुरू नहीं हुआ बीएसएनएल टॉवर

ग्राम पंचायत मुख्यालय सियाणी में बीएसएनएल का टॉवर स्थापित हुए दो साल हो चुके हैं मगर इसके चालू नहीं होने से उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण जगदीश जैन,हरी खत्री, संजय जैन, हरीश जांगिड़ व कल्याणसिंह ने बताया कि सियाणी में दो वर्ष पूर्व बीएसएनएल टॉवर स्थापित किया गया था। इस दौरान ग्रामीणों ने बीएसएनएल की सिमें खरीद ली। लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी निगम ने दूरसंचार सेवाएं शुरु नहीं की। इस स्थिति में उपभोक्ताओं को निराश होना पड़ रहा है।

हां रे, फागण फरवरियो...

हां रे, फागण फरवरियो...
. सिरोहीहोली के महापर्व को आने में अब सिर्फ सप्ताहभर का समय शेष बचा है। इसके साथ ही इसकी तैयारियां परवान चढ़ चुकी हैं। रंग, अबीर, गुलाल से लेकर रंग-बिरंगी पिचकारियां बाजार में आ चुकी हैं, वहीं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु जन्म पर मनाए जाने वाले एक खास रस्म 'ढूंढणाÓ को लेकर भी बेहद उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ देर रात तक चंग की थाप पर गूंजते फाग जैसे माहौल का मूड एकदम से बासंतिक कर दिया है।सोमवार से होलाष्टक, शुभ कार्यों पर विराम : २२ फरवरी को सूर्योदय होलाष्टक शुरू हो रहा है। इसके बाद सभी शुभ कार्य पर एकबारगी विराम लग जाता है।इसके पीछे मान्यता है कि अब सिर्फ होली की मस्ती में समय बिताया जाए, अन्य कार्यों से अवकाश कर त्योहार का लुत्फ उठाएं। होलाष्टक का समापन होलिका दहन के साथ होता है। वैसे होली की मस्ती शीतला सप्तमी तक रहती है और मजदूर अगता में मस्त पड़े रहते हैं। अगता का मतलब काम-धंधे से अवकाश एवं मस्ती का मूड में सरोबार होना होता है।होलिका दहन से मौसम की भविष्यवाणी : होलिका दहन के समय मौसम की भविष्यवाणी की भी यहां परंपरा रही है। इसमें देखा जाता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटें किस दिशा की ओर जा रही है। जिस दिशा की ओर लपटें जाती हैं, उसके आधार पर भविष्यवाणी की जाती है कि कितनी वर्षा होगी, सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी या सामान्य स्थिति रहेगी। होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी को लोग होलिका की राख को एक-दूसरे पर उछालते हैं और उसके बाद स्नान करते हैं। दोपहर को रंगों की होली खेलने के बाद शाम को लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं।माह भर पहले डंडारोपणरबी की फसल तैयार होने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व होली की उमंग काफी पहले से ही सभी ओर छा जाता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बसंत पंचमी यानि सरस्वती पूजन के अवसर पर गांव व ढाणियों में होलिका दहन के लिए डंडारोपण कर दिया गया, तो उसके साथ अबीर, गुलाल लगाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। डंडे के आसपास जलावन इकट्ठा करने को लेकर बच्चों का उत्साह इस समय चरम पर पहुंच चुका है। वहीं, कहीं चार जने इकट्ठे हुए नहीं कि होली के गीत व चंग की थाप की मस्ती घुलने लगती है।होलकियां तैयार करने में जुटे बच्चेहोली की तैयारियों में होलकियां की बात न की जाए, तो सारी बातें ही अधूरी रह जाएंगी। इसके लिए बच्चे लंबे समय से गोबर इकट्ठा करने से लेकर उसे तैयार करने में लगे हैं। इसमें बच्चे गोबर के छोटे-छोटे उपले बनाते हैं, जिसके बीच में छेद किया रहता है। उपले को पहले सुखाया जाता है, फिर छेद में रस्सी डालकर माला बनाते हैं और उस माला को होलिका पर अर्पित की जाती है। चंूकि इसके लिए समय की जरूरत पड़ती है। ऐसे में बच्चे पहले से ही होलकियां बनाने के साथ उसे सुखा-सुखा कर रख रहे हैं। इसमें बच्चों के बीच अधिक से अधिक होलकियां की माला बनाने की होड़ रहती है।मारवाड़ की विशेष रस्म 'ढूंढणाÓमारवाड़ में होली के अवसर पर एक विशेष रस्म 'ढूंढणाÓ काफी प्रचलित है। इसके तहत जिनके घरों में नवजात शिशु रहते हैं, उनके माता-पिता गेरियों (गेर नाचने वाले) को होलिका दहन के दिन शाम को घर बुलाते हैं और उनसे बच्चों को ढूंढवाते हैं। इसमें बच्चे को उसकी कोई कन्या गोद में लेकर चौकी पर बैठ जाती है और बच्चे को वस्त्र के ऊपर छाया कर देती है। इस बीच गेरिए नाचते हुए उसके ऊपर नृत्य करते हुए डांडिया बजाते हैं, साथ ही आशीर्वचन स्वरूप गीत गाते हैं, 'ढूढू ढूढू ढोकलु, आबा जतरू छोकरू/आज अतरू काले मोटु आबा जतरूÓ। इसके बाद गेरियों को मिठाई व दक्षिणा दिया जाता है। इसको लेकर भी गैर वालों में आमंत्रण देने आदि की तैयारियां जगह-जगह की जा रही है। भंग का रंग जमा हो चकाचकमस्ती का त्योहार होली में भांग का अलग ही महत्व है। इस दिन ऐसे कई लोग हैं जो भले ही कभी भांग न पीते हों, लेकिन इस दिन जरूर पीते हैं। लोग एक-दूसरे का मनुहार भी करते हैं। सो इस बार भंग का रंग जमा हो चकाचक... के लिए दुकानदारों ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। वे इसके लिए आर्डर देने से लेकर मंगवाने में जुटे हैं। वैसे जिनके यहां इस बार शादी-विवाह आदि हुए हैं, उनमें से कई अभी से भांग का आर्डर दे चुके हैं। होलिका दहन का मुहूर्तज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे के अनुसार इस बार होलिका दहन का मुहूर्त फाल्गुन पूर्णिमा रविवार को सायं काल प्रदोष वेला में ६.३४ बजे से ८.४५ बजे तक है। इस बार भद्रा दिन में ११.५९ बजे रहने से होलिका दहन प्रदोष वेला में शुभ रहेगा।