शनिवार, 20 मार्च 2010

अस्तित्व खो रही कलात्मक छतरियां

रानीवाडा 1   कस्बे के उत्तर दिशा में पहाडी के ऊपर पूर्व ठिकाने के जागीरदारों की शमशान भूमि में निर्मित ऎतिहासिक एवं कलात्मक छतरियों की देखभाल नहीं होने के कारण ये छतरियां ध्वस्त होकर खंडहर के रूप में तब्दील हो रही हैं।
ऎतिहासिक पहाडी पर सतियों के देवल के नाम से भव्य एवं कलात्मक छतरियां यहां आने वाले देशी विदेशी पर्यटकों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सैकडों वर्ष पुरानी इन छतरियों के देखरेख के अभाव में ये धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होकर खंडहर के रूप में बदल रही हंै। कई छतरियां तो अपना अस्तित्व भी खो चुकी है। जिसके खम्भे, चौकियां, छ"ो व कमानीदार दरवाजे वहां टूटे हुए व बिखरे हुए पडे हैं। ये छतरियां स्थानीय पूर्व जागीरदारों व चंपावत वंशीय राजपूतों के शमशान में स्थित हंै, जो इन्हीं के पूर्वजों की स्मृति में स्मारक के रूप में उनके वंशजों की ओर से बनवाई गई है। इसमें मुख्य रूप से तत्कालीन ठाकुर महासिंह, भभूतसिंह, गुमानसिंह चंपावत सहित उनकी महारानियों की मृत्यु के बाद उनके वंशजों ने बनवाई थी। जिनकी देखरेख व पूजा-अर्चना भी उन्हीं की ओर से की जाती है। धीरे धीरे समय के साथ ये छतरियां अब जीर्ण शीर्ण होकर क्षतिग्रस्त हो रही हैं।
कभी लगते थे मेले
ऎतिहासिक मान्यताओं के अनुसार सैकडों वर्ष पूर्व तत्कालीन जागीरदारों की मृत्यु के पpात् उनकी धर्मपत्नियां उनके साथ सती हो जाया करती थीं। इसी के चलते इन छतरियों के सतियों के देवल के नाम से पहचाना जाता है। इन्हीं छतरियों पर वर्ष में एक बार भव्य मेला लगता था। जहां इन सतियों के देवल की पूजा-अर्चना व नवदम्पती की जात भी दी जाती थी लेकिन दिवराला सतीकांड के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय की ओर से सती महिमा मंडन पर लगाई गई रोक के पpात् यहां मेलों का आयोजन हो रहा है।
हो रही है उपेक्षा
जैसलमेर जिले में पर्यटन विकास व पुरातत्व धरोहरों के संरक्षण को लेकर चल रहे सरकारी महकमें की ओर से भी इन पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण को लेकर कभी भी कोई पर्याप्त इंतजाम व कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। चंूकि चार वर्ष पूर्व जिला प्रशासन की ओर से शक्तिस्थल से इन छतरियों तक डामर सडक का निर्माण करवाया गया था ताकि पर्यटक इन छतरियों तक आसानी से पहुंचे सके लेकिन इन छतरियों के संरक्षण व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।



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