मंगलवार, 2 मार्च 2010

चमत्कारी है धानसा के महादेव

मोदरा। कहते है ईश्वर सभी प्राणियों का अपनी संतान की तरह पालन पोषण करता है और यदि कोई भी मनुष्य ईश्वर के प्रति आस्था रखता है तो ईश्वर भी उस पर कृपा दृष्टि बनाए रखते है। ऎसा ही उदाहरण है धानसा गांव के भक्त भाकरसिंह राठौड़ का। जिनकी जलंधरनाथजी के प्रति प्रगाढ़ भक्ति के कारण क्षेत्र में जलंधरनाथ मंदिर की स्थापना हो सकी। करीब 400 वर्ष पूर्व धानसा गांव में कृषक भाकरसिंह जालोर के सिरे मंदिर के जलंधरनाथ को अपना आराध्य मानते थे। वे प्रत्येक सोमवार को पैदल धानसा से जालोर के सिरे मंदिर में आराध्य की पूजार्चना के लिए जाते थे। लेकिन एक बार बारिश (हलोतरा) का मौसम था। भाकरसिंंह कृषि कार्यो में व्यस्त थे और इस कारण वे सोमवार को सिरे मंदिर जाना भूल गए। उनके घर से भाई सोमवार के दिन यह समझ कर भात (खाना)देरी से लाए कि भैया के सोमवार है और वे सिरे मंदिर गए होंगे। जब वे खेत पहुंचे तो भाकरसिंह उन्हें खेत में कार्य करते हुए दिखे और उन्होंने देखा कि भाकरसिंह ने काफी कार्य भी किया है। उन्होंने जब इस बारे में भाकरसिंह से पूछा कि क्या वे सिरे मंदिर नहीं गए। तब भाकरसिंह को पता लगा कि वे सिरे मंदिर जाना भूल गए है। वे उसी समय सभी कार्य छोड़कर सिरे मंदिर के लिए रवाना हो गए। रास्ते में उन्हें नाथ के वेश में स्वयं जलंधरनाथ मिले। उन्होंने भाकरसिंह से पूछा कि कहां जा रहे हो तो उन्होंने कहा कि वे सिरे मंदिर जलंधरनाथजी के दर्शन के लिए जा रहे है। इस पर उन्होंने जलंधरनाथ से उसी स्थान पर मिलवाने की बात कही तो भाकरसिंह को विश्वास नहीं हुआ। तब नाथ के वेश में जलंधरनाथ ने उन्हें एक खेजड़ी की सूखी लकड़ी दी और कहा कि यह लकड़ी सात दिन में हरी हो जाएगी। इस पर भाकरसिंह ने वह लकड़ी ले ली और उसे उसी स्थान पर खड़ा कर दिया। जब भाकरसिंह ने पीछे मूड़ कर देखा तो उन्हें उस स्थान पर पगलिए मिले जहां पर नाथ खड़ा था। तब उन्हें विश्वास हो गया कि वे स्वयं जलंधरनाथ ही थे। सातवें दिन खेजड़ी की लकड़ी पर कोंपल फूट गई। उसी स्थान पर एक पत्थर का बड़ा सा कुण्ड, नंदी और शिवलिंग भी मिला।उस कुण्ड में काफी समय तक सात गांवों के लिए सामूहिक प्रसादी भी होती थी, लेकिन कुछ विवाद हो जाने से यह प्रथा बंद हो गई। क्षेत्र समेत आसपास के गांवों के ग्रामीणों की इस मंदिर के प्रति आस्था देखते ही बनती है

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