सोमवार, 8 मार्च 2010

ऊंचा होता आकाश

मैंने अब तक कि जिंदगी में अपने चारों ओर जितनी तेजी से औरतों की दुनिया को बदलते देखा है, उस गति से शायद ही कुछ और बदला हो। स्त्री ने शून्य से उठकर शिखर तक का सफर तय किया है। अब तक जिस दुनिया के दरवाजे उनके लिए बंद थे, उन्होंने हर उस दरवाजे को खटखटाया और वहां अपने लिए जगह बनाई। उन्होंने उन इलाकों में घुसपैठ की, जो अब तक सिर्फ पुरुषों के क्षेत्र समझे जाते थे। स्त्री का यह सफर बहुत लंबा और कीमती है क्योंकि उसने शून्य से शुरुआत की थी। औरत ने यह करके दिखाया है कि वह किसी भी मामले में पुरुषों से कम या कोई सेकेंड सेक्स नहीं है। मन, बुद्धि, अंतरात्मा, मेधा और कौशल हर चीज में वह उतनी ही संपूर्ण मनुष्य है, जितना कि कोई पुरुष। स्त्री के ऊंचे होते आकाश ने हमें आंखें ऊंची करके उसकी ओर देखने के लिए मजबूर किया है।एक दूसरा चेहरा भी है। बेशक बंधनों को तोड़कर, नियमों को दरकिनार करके अपनी जगह बनाने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। आज भी हमारे देश की बहुसंख्यक स्त्रियां पितृसत्तात्मक पाबंदियों के बीच एक छोटी सी दुनिया में जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। जिंदगी, जहां कोई खिड़की नहीं खुलती, जहां से होकर कोई राह नहीं निकलती, जहां न सूरज उगता है, न रोशनी की किरण फूटती है। जहां हवाओं की आवाजाही पर भी पहरे हैं। सारी उन्नति के बावजूद ये भी इस उन्नत देश की स्त्रियों की एक शक्ल है, जिससे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। पर वक्त के साथ बदलाव की उम्मीदें और-और पुख्ता होती जाती हैं।आज उम्र के इस पड़ाव पर जब तीस साल पहले की दुनिया को लौटकर देखती हूं तो सुख और आश्चर्य से भर जाती हूं।
आज औरत अपनी आंखों में ढेर सारी चमक लिए कितने आत्मविश्वास से भरी हुई है। वो ज्ञान की चमक से रोशन है, वह दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना रही है। अब वह सिर्फ रिश्तों में, किसी की मां या किसी की पत्नी के रूप में ही नहीं जानी जाती। उसकी अपनी एक आजाद हैसियत है। उसके विचार ओढ़े हुए या किसी और के लादे हुए नहीं हैं। वह संसार को अपनी निगाहों से देख रही है। अपनी तरह से गढ़ रही है।उनके रहन-सहन और पहनावे में भी बहुत फर्क आया है। हमने जिंदगी भर सिर्फ साड़ी या सलवार-कुर्ता ही पहना। आज तो लड़कियां परिधान के भी बने-बनाए नियमों और बंधनों से भी बाहर निकल रही हैं। हर मामले में उनकी अपनी पसंद-नापसंद है। अब वो सिर्फ सिर हिलाने वाली कठपुतली भर नहीं हैं। अब वह आगे बढ़कर पूरी शिद्दत से ‘ना’ भी कह सकती हैं।सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। इन बदलावों का जहां एक सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है, वहीं कुछ नकारात्मक असर भी नजर आते हैं। स्त्री ने तो अपनी सीमाओं को तोड़ा और बहुत आगे निकल गई, लेकिन पुरुष अब भी वहीं के वहीं हैं। बदलती हुई स्त्री के साथ-साथ पुरुष बदलने को तैयार नहीं हैं। घर से बाहर निकलकर पुरुषों के क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली औरत से भी घर के भीतर पुरुष की अपेक्षाएं वही पचास साल पुरानी हैं। घर की सीमाओं में पुरुष उसके कार्यक्षेत्र को साझा करने के लिए तैयार नहीं है। लिहाजा रिश्तों में एक किस्म का असंतुलन पैदा हुआ है। तलाक, अलगाव और बिना शादी के अकेली रहने वाली स्त्रियों की संख्या बड़े शहरों और महानगरों में बहुत तेजी से बढ़ रही है।





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