शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

इस बार छोटे मियां भी दिखाएंगे अपने जलवे

  •  जोधपुर. मारवाड़ में फागण की दस्तक के साथ ही होली के पारंपरिक गीतों का गायन शुरू हो गया है। जोधपुर में श्लील गाली गायन की खास परंपरा रही है जिसे कुछ लोग आगे बढ़ा रहे हैं तो कुछ इसका वर्षो से निर्वहन कर रहे हैं। इन दिनों भीतरी शहर की गलियों में श्लील गाली गायन की तैयारियां जोरों पर हैं। माईदास थानवी को श्लील गाली गायन का सरताज माना जाता है। उनकी गालियों का गजब का क्रेज है। हर साल वर्तमान परिवेश पर नई गालियां लिखी और गाई जाती हैं, लेकिन इस बार कई छोटे मियां भी इसमें पारंगत होकर जलवा दिखाने वाले हैं।

म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई.............

वचनाराम देवासी सामरानी
म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई ईंदानी ...........!राजस्थानी लोकगीत की यह पंक्तिया अब मात्र गुनगुनाते तक सिमित रह गई है!पनिहारी के सिर पर शोभित होने वाला मुकुट ईंदानी अब बीते जमाने की बात बन कर रह गई है!आजकल की युवतियो को ईंदानी की जानकारी ही नहीं है!क्योकि आज न तो पनघट है,और न ही पनिहारी तो फिर ईंदानी किस कम की!विज्ञानं के युग में घर-घर में नल व हैंडपंप लगे होने के कारण घर से बहार कोई पानी भरने की परम्परा ही खत्म हो गई है!जिस जमाने ईंदानी का रिवाज था उस समय बेटी की दहेज में अवश्य दी जाती है!राजस्थान के मारवाड़ अंचल में पानी पानी से भरे घड़े को सिर पर उठाने के लिए ईंदानी बढिया उपकरण हुआ करती थी!

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

30 मिनट में खाने का करें काम तमाम


 कभी  काम तमा स्कॉलरशिप तो कभी मार्कशीट की सेहत सुधारने के लिए पढ़ाई के मोर्चे पर प्रतियोगिता में जुटे रहने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रों की पेटपूजा भी अब प्रतियोगिता बन गई है। जी हां, जानकर हैरानी तो होगी लेकिन विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर की चर्चित बैम्बू कैंटीन में अब लंच करना भी प्रतियोगिता से कम नहीं रह गया है। दोपहर साढ़े बारह बजे से शुरू होने वाली यह प्रतियोगिता ढाई बजे तक चलती है और हर छात्र को सख्त हिदायत है कि वह आधे घंटे के भीतर न सिर्फ खाना लेगा बल्कि उसे खत्म क र सीट खाली करेगा।विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कैंपस में यहां-वहां नोटिस लगाकर छात्रों को सूचित किया जा रहा है कि अब बैम्बू कैंटीन में पेटपूजा के लिए होने वाली प्रतियोगिता के नए नियम क्या हैं। प्रशासन के मुताबिक अब लंच दोपहर 12:30 से 2:30 के बीच चार चरणों में होगा और एक बार में पचास से ज्यादा छात्रों को कैंटीन में एंट्री नहीं दी जाएगी। खास बात तो यह है कि हर छात्र को अपना खाना 30 मिनट के भीतर ही खत्म करना होगा। छात्रों की बात करें तो उनका कहना है कि आज जब हर मोर्चे पर कम्पीटिशन का सामना करना पड़ रहा है।प्रशासन के इस कदम से अब खाना भी चैन से खाना दूभर हो गया है। छात्रों ने बताया कि इस बात को लेकर जब उन्होंने कैंटीन संचालकों से शिकायत की तो उनका कहना था कि निर्धारित समय से पहले या बाद में आएं। लेकिन इस बात का उनके पास कोई जवाब न था कि पहले खाना तैयार नहीं हुआ और बाद में बचा नहीं तो क्या होगा? डिप्टी डीन छात्र कल्याण (दक्षिणी परिसर) डॉ. दिनेश वाष्ण्रेय ने बताया कि प्रशासन को यह कदम छात्रों के रवैये के मद्देनजर उठाना पड़ रहा है।छात्र लंबे समय तक कैंटीन में ही डटे रहते हैं चार लोगों की टेबल को दो-दो छात्र घेरे रखते हैं। ऐसे में जो छात्र खाना खाने के उद्देश्य से कैं टीन पहुंचते हैं उन्हें परेशानी होती है। डॉ. वाष्ण्रेय ने बताया कि कैंटीन में भीड़ बढ़ने का एक और कारण अरावली व सारामती हॉस्टल के छात्रों का भी यहां पहुंचना है। कारण हॉस्टल मेस का बंद होना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कैंपस में बढ़ी भीड़ को देखते हुए यह व्यवस्था कुछ समय के लिए की गई है और जैसे ही स्थिति सुधरेगी और कैंटीन में पहुंचने वाले टाइमपास करना छोड़ खाना खाकर जगह छोड़ने लगेंगे तो समय की पाबंदी भी खत्म कर दी जाएगी।

समझौता एक्सप्रेस की सुरक्षा रामभरोसे

नई दिल्ली. भारत-पाकिस्तान के बीच चलने वाली अटारी एक्सप्रेस (समझौता एक्सप्रेस) और पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है। ट्रेन के साथ ही लाखों यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) के मात्र 212 जवानों के हवाले है। मालूम हो कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रोजाना चार से पांच लाख यात्री यात्रा करते हैं। यह हालत उस समय है, जब अटारी एक्सप्रेस हर पल आतंकियों के निशाने पर रहती है। कुछ दिन पूर्व आतंकियों ने अटारी स्टेशन को ही उड़ाने की धमकी दी थी। इसके मद्देनजर केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने अटारी स्टेशन का दौरा भी किया। हालांकि सरकार का दावा है कि स्टेशन और यात्रियों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था की गई है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। रेलवे के एक आला अधिकारी ने बताया कि आरपीएफ के 212 जवानों में से 30-40 जवान अटारी एक्सप्रेस के साथ पाकिस्तान तक जाते हैं। ट्रेन में अमूमन ढाई से तीन सौ यात्री सवार रहते हैं। ऐसे में जवानों पर अत्यधिक दबाव रहता है। यात्रियों के सामानों की जांच के लिए तीन स्कैनर मशीन हैं, लेकिन काम केवल एक ही करती है। दो स्कैनरों को तो अब तक स्थापित भी नहीं किया गया है। दोनों स्कैनर मशीन दो वर्ष से अधिक समय से रेलवे के गोदाम में धूल फांक रही हैं। सामानों की जांच शाम छह से रात के नौ बजे तक की जाती है। ऐसे में एक मशीन से सामानों की सही ढंग से जांच नहीं हो पाती है। उन्होंने बताया कि यात्री पहले बुकिंग के सामान अपने साथ ही ले जाते थे, लेकिन अब एसएलआर के माध्यम से जाता है। यानी बुकिंग के सामानों की अलग से जांच की जाती है। इसके अलावा सामानों की बुकिंग पहले से नहीं की जाती है। यात्रा के दिन ही बुकिंग की जाती है, जिसके चलते भी जांच में देरी हो जाती है। उन्होंने बताया कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के 18 प्लेटफार्मो की सुरक्षा और जांच भी आरपीएफ के इन्हीं जवानों को करनी होती है। जवानों की भारी कमी के बारे में रेल मंत्रालय को कई बार सूचित किया जा चुका है। लेकिन, आतंकी घटनाओं में बढ़ोतरी के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है। गौरतलब है कि 18 फरवरी 2007 को आतंकियों ने अटारी एक्सप्रेस को निशाने पर लिया था। जिसमें कई यात्रियों की जान चली गई!

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

अखियां श्याम दरस की प्यासी..

 खाटूश्यामजी. दूर दराज से कई किमी का सफर, लंबी पदयात्रा और घंटों कतार, भक्त ये सब कुछ बस बाबा की एक झलक पाने के लिए कर रहे हैं। इतने जतन के बाद लखधणी दातार के दरबार में दर्शन के लिए जो एक मिनट का समय मिल रहा है वह एक साथ 350 श्रद्धालुओं की झोली खुशियों से भर रहा है। दशमी के दिन तक बाबा के दरबार में करीब छह लाख श्रद्धालुओं की हाजरी लग चुकी है। बाबा के दर्शनों की आस, देश कोने-कोने से श्याम भक्तों को खींच ला रही है। बाबा का मुख्य मेला गुरुवार को भरेगा। एकादशी के मौके पर भरने वाले मेले में करीब चार लाख से अधिक श्रद्धालु जुटने की उम्मीद है। हर तरफ आस्था, भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है। खाटूधाम की धर्मशालाआंे में भी श्याम के भजन कीर्तनों का दौर चल रहा है। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने के कारण बुधवार को प्रशासन को रींगस-खाटूश्यामजी मार्ग को वनवे में तब्दील करना पड़ा है। श्रद्धालुओं की भीड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रींगस से खाटूश्यामजी 20 मिनट मे पहुंचने वाले वाहन अब तीन घंटे मे खाटू पहुंच रहे हैं। अलग-अलग टोलियों और निशानों के साथ भक्त बाबा के दरबार में पहुंच रहे हैं।





गुजरात में बन रहा है अनोखा वृक्ष मंदिर

 अहमदाबाद. पर्यावरणीय संतुलन को लेकर पूरी दुनिया चिंतित है। ग्लोबल वॉर्मिग की समस्या से निपटने के लिए चिंतन, मनन व मंथन चल रहा है। इस बीच गुजरात के विरमगाम के भाजपा विधायक कमाभाई राठौड ने एक अनूठा प्रयास आरंभ किया है। वे अपने गांव वडगाम में वृक्ष मंदिर बनवा रहे हैं। इस अनूठे मंदिर में भगवान शंकर के साथ ही वृक्ष देव के रूप में तुलसी की पूजा की जाएगी।उधर, मंदिर में दर्शन करने आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को कहीं न कहीं एक वृक्ष रोपना पड़ेगा। हाल ही में इस मंदिर का शिलान्यास किया गया था। इस अनूठे मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ कर दिया गया है और आगामी दो महीने में इसके बनकर तैयार होने की उम्मीद है। विरमगाम के भाजपा विधायक कमाभाई अपनी जमीन पर वृक्ष मंदिर बनवा रहे हैं। मंदिर में पौध उपलब्ध करवाने के लिए वन विभाग ने अनुमति

रेल बजट से खुश नहीं मेवाड़

उदयपुर. रेल बजट की घोषणा के बाद मेवाड़ की दशा मावली—बड़ी सादड़ी रेल खंड की भांति दिखाई दे रही है जिसका धणी—धोरी कोई नहीं है। मेन लाइन से बहुत दूर व विकास की धारा से भटके हुए मेवाड़ को बजट में रेल मंत्री ममता बैनर्जी ने पूरी तरह से निराश किया है। कांग्रेस के नेताओं ने बजट को संतुलित बताया और भाजपा ने पूरी तरह निराशजनक। रेलों में यात्री किराया व माल भाड़ा न बढ़ाना राहत की बात है मगर विकास की दृष्टि से मेवाड़ ठगा सा रह गया है। उदयपुर से कम से कम दो नई गाड़ियां चलने, बांद्रा, इंदौर व सियालदाह एक्सप्रेस के फेरे बढ़ने, चेटक एक्सप्रेस का मार्ग बदलने व अजमेर इंटरसिटी को जयपुर तक चलाने की बजट में घोषणा की उम्मीद थी।

कैसी होगी तेरी रात परदेस में

कैसी होगी तेरी रात परदेस में,

चाँद पूछेगा हालात परदेस में।

ख्व़ाब बनकर निगाहों में आ जाएँगे,

हम करेंगे, मुलाकाल परदेस में।

बादलों से कहेंगे कि कर दे वहाँ,

आँसुओं की ये बरसात परदेस में।

रंग चेहरे पे लब पे हँसी दिल को चैन,

कौन देगा ये सौग़ात परदेस में।

तुमको महसूस होती नहीं जो यहाँ,

याद आएगी वो बात परदेस में।

हर क़दम पे नज़र तुमको आएँगे हम,

देखना ये करामात परदेस में।

ज़ेहन की वादियों में सजालो इन्हें,

काम आएँगे जज्ब़ात परदेस में।

आपसे जब सामना होने लगा,

ज़िन्दगी में क्या से क्या होने लगा।

चैन मिलता है तड़पने से हमें,

दर्द ही दिल की दवा होने लगा।

ज़िन्दगी की राह मुश्किल हो गई,

हर क़दम पर हादसा होने लगा।

दोस्तों से दोस्ती की बात पर,

फ़ासला दर फ़ासला होने लगा।

जो ग़जल में शेर बनकर के रहा,

काफ़ियों से वो ज़ुदा होने लगा।

जैसे हो तस्वीर इक दीवार पर,

आदमी अब क्या से क्या होने लगा।

ये तुम्हारी याद है या ज़ख्म है,

दर्द पहले से सिवा होने लगा।

मोतियों की तरह चेहरा तेरा सच्चा लगता,

हमको दुनिया में कोई और न अच्छा लगता।

तेरे माथे पे जो बिंदिया है, सलामत रखना,

ये अँधेरों में कोई चाँद चमकता लगता।

किस तरह आँख मिलायें, कभी ये तो बतला,

तेरी पलकों पे सदा शर्म का पहरा लगता।

मैंने माँगा था इबादत में, इन्हीं लमहों को,

साथ में तेरे मुझे वक्त भी ठहरा लगता।

तेरे बिन ये पहला-दिन,

सूना-सूना निकला दिन।

सूरज किरनें धूप वही,

फिर भी बदला बदला दिन।

तेरे साये, ढूंढ़ रहा है,

कैसा है ये पगला दिन।

तनहाई के सन्नाटों में,

घूमा झुंझला-झुंझला दिन।

शाम तलक तड़पा यादों में,

फिर मुश्किल से सम्भला दिन।

ढूंढ़ता है आदमी, सदियों से दुनिया, में सुकून।

धूप में साया मिले, कमल जाये सहरा में सुकून।

छटपटाती है किनारों, पर मिलन की आस में

हर लहर पा जाती है, जाकर के दरिया में सुकून।

बेक़रारी है कभी, पूरे समन्दर की तरह,

और कभी मिल जाता है बस, एक क़तरे में सुकून।

ज़िन्दगी को इससे ज्य़ादा और क्या कुछ चाहिए?

लबस हो इक प्यार का, और उसके लमहात में सुकून।

हर सवाली चेहरे पे लिख़ी इबारत देखिए,

चैन है कि न आँखों में, और कौन से दिल में सुकून।

वो खुदा से कम नहीं लगता है, मुझको दोस्तो,

मेरे ख़ातिर माँगता है जो दुआओं में सुकून।

ये उसी दामन की भीनी खुशबू का एहसास है,

जो मुझे महसूस होता है हवाओं में सुकून।



हरता-फरता चोट ,उड़ाग्या मूंडा रा रंग

हार्या केड़े देखजो , कठे-कठे ही खोट ।

कतरा जिगरी कर गया ,हरता-फरता चोट ।।

हरता-फरता चोट ,उड़ाग्या मूंडा रा रंग ।

हाल-चाल बेहाल , कदी न कर ऐसो संग ।।

के ’वाणी’ कविराज, जद दारू-पाणी नेड़े ।

पी-पी के जो जाय , आय कुण हार्या केड़े ।।

ममता ने किया सबको खुश

 नई दिल्ली। रेल मंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर लोकलुभावन बजट पेश किया। पश्चिम बंगाल व अन्य राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यात्री किराए व माल भाडे में कोई बढोतरी नहीं की गई है। उल्टा खाद्य पदार्थो व केरोसीन के मालभाडे में सौ रूपए की कमी भी की गई है। ममता ने रेलवे को मानवीय चेहरा देने की कोशिश के तहत एक बडा कदम उठाते हुए कैंसर रोगियों को स्लीपर व एसी थ्री में मुफ्त में यात्रा की सुविधा मुहैया कराई है।ममता ने कहा कि पांच साल में पूरे देश को रेल से जोड दिया जाएगा। आधारभूत ढांचे पर वर्ष ध्यान देते हुए एक हजार किमी तक का रेलवे ट्रेक बनेगा। साथ ही 94 स्टेशनों को अपग्र्रेड को किया जाएगा। कई स्टेशनों का नाम महापुरूषों पर रखा जाएगा। 54 नई ट्रेनें चलाई जाएगी। और 10 दूरतों ट्रेनें चलेंगी। इनमें जयपुर-मुंबई भी एक है। यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखते हुए ई टिकट सरचार्ज 40 रूपए से घटाकर 20 रूपए किया जाएगा।
















अधूरी रह गई दर्शन की आस

 नीमकाथाना/नारनौल. हमउम्र कमला देवी, कबूल देवी और धन्नी देवी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस श्याम बाबा के दरबार में वे ध्वजा चढ़ाने जा रही हैं, वे ही इतनी जल्दी उनको अपने पास बुला लेंगे। कमला व धन्नी तो मन्नत पूरी होने पर श्याम बाबा की ध्वजा का जोड़ा पूरा करने जा रही थीं, जबकि कबूल पहली बार उनके साथ श्याम बाबा के दर्शनों की अभिलाषी थी। धन्नी देवी ने हृदय रोग से पीड़ित बेटी सुमन के स्वस्थ होने की कामना की थी। श्यामबाबा ने कामना पूरी की तो मां-बेटी दोनों साथ ध्वजा चढ़ाने जा रही थीं और हादसे में दोनों चल बसीं। कमला ने अपने भाई की जेल से रिहा होने की मन्नत मांगी थी। बाबा ने कामना पूरी कर दी थी और वह जोड़ा पूरा करने के लिए ध्वजा लेकर जा रही थी। कमला व धन्नी के बाबा के दरबार में जाने की खबर पाकर कबूल ने भी उनके साथ जाने का मन बना लिया। वह पहली बार श्याम दर्शन को जा रही थी, लेकिन वह इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी। गांव के लोगों ने बताया कि तीनों का आपस में गहरा मेलमिलाप था। कमला व कबूल तो रिश्ते में जेठानी-देवरानी थीं। वैसे तीनों एक ही कुनबे की सदस्य थीं। खाटू श्याम जाते समय कमला के साथ उसकी पोती छोटी व दोहिता देवेंद्र भी था। उनका जत्था 21 फरवरी को सुबह गांव से रवाना हुआ था। हादसे की सूचना मिलते ही सभी लोग एकत्रित हो गए और बिना ध्वजा चढ़ाए ही वापस लौट आए।
मातम में बदला भक्ति का माहौल
विश्राम कैंप में श्रद्धालु भक्ति के रंग में सराबोर थे। चंद पल में ही काल बनकर आई ट्रेन ने पांच श्रद्धालुओं की जान ले ली। विश्राम कैंप का माहौल मातम में तब्दील हो गया।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

चल रही है पत्नी पीड़ित संघ की भूख हड़ताल


जोधपुर. शादी के बाद वह मेरे पिताजी के नाम की जायदाद को खुद के नाम करवाने की जिद करने लगी। मैंने खूब समझाया लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही। मैं अपने माता-पिता से अलग नहीं होना चाहता था। यह बात उसे मंजूर नहीं हुई। उसकी नाजायज मांग न मानने पर तीन दिन जेल में बिताने पड़े।ऐसी बीवी से तो कुंवारा ही भला था। नई सड़क चौराहे पर पत्नी पीड़ित पति संघ के तत्वावधान में रविवार से शुरू हुई क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे लोगों से भास्कर ने बातचीत की तो उनके अंतस से वेदना के ऐसे ही स्वर फूटे। इस दौरान कुछ लोग तो अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते सुबक पड़े।सरस्वती नगर निवासी मुकेश अग्रवाल की शादी 11 जुलाई 07 को पुंगलपाड़ा निवासी मोहनलाल जालानी की पुत्री अंजू के साथ हुई थी। छह महीने तो खुशी-खुशी गुजरे लेकिन बाद में पत्नी की एक मांग ने मुकेश के परिवार को मुश्किल में डाल दिया। मुकेश ने बताया कि उसकी पत्नी ने पिताजी का मकान खुद के नाम करवाने की जिद की।इसी बात को लेकर मार्च 08 को दोनों में झगड़ा हो गया। बात बढ़ते बढ़ते इस हद तक पहुंच गई कि अप्रैल 08 में पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना व घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवा दिया। उसे तीन दिन जेल में बिताने पड़ गए। तब से अब तक वह माता-पिता से अलग किराए के मकान में रह रहा है ताकि उन पर तो आंच न आए।अब वह पत्नी से तलाक का इच्छुक है। विद्यानगर में रहने वाली विजयलक्ष्मी की कहानी भी कम कारुणिक नहीं है। उसने अपनी बहन के बेटे वीरेंद्र कुमार शर्मा को अपने बेटे की तरह पाला-पोसा और वर्ष 2004 में उसकी शादी नीमच में रहने वाली कल्पना से कर दी। कुछ साल तक सब कुछ ठीक-ठाक रहा, लेकिन आठ-दस माह पूर्व पति-पत्नी में झगड़ा हो गया।मौसी का मकान खुद के नाम पर करने की बात को लेकर वीरेंद्र की अपनी पत्नी से अनबन हो गई। उसे तो इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ा, उसकी मौंसी व मौंसा विनोद कुमार को भी पुलिस ने बेजा तंग किया। अब न्यायालय में मुकदमा चल रहा है। वीरेंद्र की मौंसी अब कल्पना के साथ कोई संबंध रखना नहीं चाहती।मेहरों का चौक नया बास में रहने वाले राकेश मेहरा की शादी 28 फरवरी 09 को अजमेर के वैशाली नगर निवासी राजेंद्र मेहरा की पुत्री कोमल के साथ हुई थी। यहां पर वधू पक्ष ने दहेज का सामान बाद में भेजने की बात कहते हुए बारात को रवाना कर दिया। वह सामान तो खैर क्या आना था, तीन जून को पीहर गई कल्पना भी लौट कर नहीं आई।इतने पर ही बात खत्म नहीं हुई। एक दिन अचानक ही अजमेर से आई पुलिस राकेश व उसके मां-बाप को पकड़कर ले गई। उन पर दहेज प्रताड़ना व घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करवाया गया। तब से राकेश का पूरा परिवार परेशान है। हालांकि उसके पिता थानचंद मेहरा अब भी चाहते हैं कि उनकी पुत्रवधू घर लौट आए।

फाल्गुन में गिरी सावन-सी फुहार

जब लोग जागे तो आसमान की ओर निहारते उन्हें लगा नहीं कि ये फाल्गुन का महीना है। दिनभर गिरी फुहारे और बूंदाबांदी ने सावन की याद दिला ताजा कर दी। मौसम का मिजाज बदलते ही लोगों की दिनचर्या भी बदल गई। कुछ भीगने से बचते रहे तो कुछ सर्दी में भी फुहारों का आनंद लेते देखे गए। सुबह से ही बादलों ने पूरा आसमान ढ़क लिया था। सुबह लोग तैयार होकर कार्यालय की ओर रवाना होने की तैयारी कर रहे थे कि करीब साढ़े नौ बजे फुहारें गिरनी शुरू हो गई और उसके बाद दिनभर टिप-टिप का दौर जारी रहा। हालांकि सुबह नौ बजे के करीब कुछ देर के लिए धूप निकली। धूप निकलते ही लोग तैयार होकर कार्यालय की ओर रवाना होने ही वाले थे कि फिर से बूंदाबांदी शुरू हो गई। उसके बाद दिन में रह-रहकर फुहारें पड़ती रही। दोपहर तक इतनी बारिश हो चुकी थी कि सड़कें गीली हो गई। लोग बूंदाबांदी के कारण कहीं निकल नहीं पा रहे थे क्योंकि कुछ देर ठहरने के बाद फिर से बूंदाबांदी शुरू हो जाती। 12 बजे के करीब इतने बादल इतने घिर गए मानो तेज बारिश होगी मगर कुछ देर ही बूंदाबांदी हुई। तीन बजे के करीब फिर से सूर्य बादलों की ओट से निकलने की कोशिश करता रहा मगर उसका प्रयास सफल नहीं हो सका। स्कूल की छुट्टी होते ही अभिभावक छाता लेकर स्कूल पहुंच गए ताकि बच्चे भीगक र घर नहीं आएं। जिन बच्चों के अभिभावक ऐसा नहीं कर पाए उनके बच्चे भीगते हुए घर पहुंचे। मौसम का असर बाजार पर भी पड़ा। बूंदाबांदी के कारण लोग घर से नहीं निकले जिसके कारण बाजार में दिनभर रौनक फीकी रही। सड़कों पर भी भीड़-भाड़ कम रही। जैसे ही कुछ देर के लिए बूंदाबांदी बंद होती लोग कुछ काम निबटाने के लिए निकल जाते मगर बीच में फुहारें पड़ते ही सुरक्षित जगह ठहर जाते। लोग इससे परेशान भी हुए क्योंकि इससे उनकी दिनचर्या प्रभावित हुई। दूसरी ओर मौसम का मिजाज बदलते ही समौसे-कचौड़ी और चाय की थडिय़ों पर भीड़ लग गई। दिनभर में 2.5 मिलीटर बारिश दर्ज की गई।इसलिए बदला मौसम का मिजाजमौसम विभाग ने एक दिन पहले ही प्रदेश में मौसम के परिवर्तन के संकेत दे दिए थे। बीते 24 घंटे से पश्चिमी विक्षोभ का असर प्रदेश पर बना हुआ है इसी कारण रविवार को तापमान बढ़ गया था और सोमवार को बादल और बूंदाबांदी का सामना करना पड़ा। जयपुर मौसम विभाग के मुताबिक आगामी दो दिनों तक बादल छाए रहने और बूंदाबांदी की संभावना है। इसके बाद मौसम सामान्य होगा।

सरस्वती बता रही है मेवाड़ का रिश्ता


उदयपुर. यदि हरियाणा के सैमाण व फरमाणा में वैदिक सरस्वती की प्रधान सहायक नदी दृषद्वती के प्रवाह क्षेत्र में हुई खुदाई में मिले अवशेषों की जुबानी जाने तो यह स्वीकारना होगा कि वैदिक काल में मेवाड़ का सरस्वती सिंधु निवासियों के साथ अच्छे ताल्लुकात थे।
यह सभ्यता का वह सांस्कृतिक दौर था जब हड़प्पावासियों की नगर नियोजन विधि और मेवाड़ की ग्राम्य निवेश विधि को देशवासी न केवल जान रहे थे बल्कि उसका अनुसरण भी करने लगे थे। डेकन कॉलेज, पुणो के पुरातत्वविद् प्रो. वसंत शिंदे ने यह खुलासा दृषद्वती नदी के किनारे पर बड़े क्षेत्र में उत्खनन के बाद किया।
हरियाणा के रोहतक के निकट बसे फरमाना के आसपास बड़े क्षेत्र में उत्खनन शुरू किया गया है। यह उत्खखन इन दिनों जारी है। जो अवशेष मिले हैं, वे बताते हैं कि यह उस काल में कस्बे की तरह आबाद था।
वहां करीब 3500 ईसा पूर्व कृषि के साथ ही व्यापारिक गतिविधियां अस्तित्व में थीं और इन गतिविधियों में मेवाड़ भी अपना योगदान दे रहा था। मेवाड़ की घग्घर नदी इसी सरस्वती, दृषद्वती का पुनरूप मानी जाती है।
क्या मिली समानताएं : डॉ. शिंदे के अनुसार उदयपुर संभाग में बनास बेसिन में गिलूंड (राजसमंद), बालाथल (उदयपुर) से जो बर्तन मिले हैं, वैसे ही बर्तन फरमाना में मिले हैं। ऐसे बर्तनों को रिजर्वस्लिप पोट्री के रूप में जाना गया है।
ये बर्तन मेवाड़ से ही वहां पहुंचे होंगे, इस बात की प्रबल संभावना है क्योंकि इसी क्षेत्र से ग्रेनाइट भी वहां पहुंचा था और वहां उसका उपयोग मोती बनाने के किया गया। वहां मोती निर्माण की कार्यशाला का भी पता चला है। इसके लिए कच्चे माल रूप में गार्नेट मेवाड़ के आसपास से ही वहां पहुंचा था।
उस समय दृषद्वती के आसपास के क्षेत्र में अनाज की भरपूर पैदावार थी और संभवत: वहां से अनाज मेवाड़ आता था। गिलूंड में अनाज के बड़े बड़े गोदाम होने की पुष्टि हो चुकी है। मेवाड़ और मेवाड़ के अन्य हिस्सों से तांबा भी वहां पहुंचता था। गुजरात से शंख और सिंध क्षेत्र से नीला पत्थर वहां पहुंचता था। बहुत संभव है कि यह व्यापार पशुओं पर माल का परिवहन करने वालों के मार्फत ही होता था।
क्या सीखा परस्पर : शिंदे का मानना है कि हड़प्पा के साथ मेवाड़ के रिश्तों पर पुनर्विचार की संभावना गिलूंड की खुदाई के साथ ही बनी। मेवाड़ में लगभग उसी काल में ग्राम निवेश का जोर था जबकि हड़प्पावासी नगर निवेश कर रहे थे। बाद में उन्होंने जहां भी बस्तियां बसाई, ग्राम निवेश किया और इसकी प्रेरणा मेवाड़ रहा।
दोनों ही क्षेत्रों में स्थानीय लोग ही थे किंतु वे एक दूसरे की सभ्यता व संस्कृति से सीख रहे थे। ईसा पूर्व 1500 के आसपास जबकि अकाल या अन्य कारणों से सरस्वती प्रवाह क्षेत्र से लोगों का पलायन हुआ तो मेवाड़ सहित पुष्कर-मेरवाड़ा, लूणी-मारवाड़, सौराष्ट्र, उत्तरी गुजरात में लोगों ने आश्रय लिया। बहुत संभव है ये सारस्वत कहे जाने लगे।
कहां है जिक्र : सप्तसैंधव प्रदेश व सरस्वती नदी का जिक्र ऋग्वेद (7, 95, 2; 2, 14, 6; 7, 95, 1; 6, 21, 2 से 9) और महाभारत (95, 24) में आया है। ब्रrावैवर्तपुराण को सूत ने दृषदृती के तट पर ही ऋषियों को सुनाया था।
इसी नदी के किनारे विद्या व वाक् की परंपरा रही और अन्य क्षेत्रों से सांस्कृतिक संबंधों, व्यापारिक गतिविधियों के चलते मेवाड़, सौराष्ट्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और वर्तमान पाकिस्तान में राजनीति के केंद्रों के विकास के साथ ही प्रशासन, जनतंत्र (जनपद), वाणिज्य, कृषि पद्धतियों का विकास हुआ।

दुल्हन नहीं, शव पहुंचा ससुराल

उदयपुर. राजसमंद के कोठारिया से तीन दिन पहले सात फेरे लेकर ससुराल झालावाड़ रवाना हुई दुल्हन कल्पना मावली के पास सड़क हादसे में जख्मी हुई थी। तीन दिन अस्पताल में बेसुध सांसें लेकर नववधू ने शुक्रवार तड़के साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली।
रो रोकर बेहाल परिजनों ने ससुराल वालों की इच्छा का सम्मान रखते हुए अपनी बिटिया के निर्जीव शरीर को दुबारा विदा किया लेकिन अबकी बार सुखी जीवन के आशीर्वाद की बजाय प्रार्थना उसके मोक्ष के लिए थी। एमबी अस्पताल में तीन दिन तक कल्पना जीवन मृत्यु के बीच झूलती रही, चिकित्सकों ने पूरी कोशिश की लेकिन दवाओं और दुआओं के बावजूद वार्ड से लाल जोड़े में सजी धजी दुल्हन का शव ही बाहर आया। मृतका के हाथों की मेहंदी का रंग उतना ही गाढ़ा था और कांकण डोरे तक जस के तस बंधे हुए थे।
नव ब्याहता को जड़ देखकर भावनाओं का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मुर्दाघर के बाहर परिजन पड़ोसी, ससुराल वाले तो रोए ही, यहां तक अस्पताल कर्मचारियों की भी आंखें भर आईं। रूदन और क्रंदन से गमगीन माहौल भारी हो गया। हादसे में घायल दूल्हे अभिनव सिंह सोनगरा की हालत भी खराब थी। दाम्पत्य जीवन के पहले कदम पर ही अपनी जीवन साथी से बिछोह पर मानों दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा। ढांढस देने वालों के पास भी शब्द नहीं थे तो वे उसे क्या समझाते। सभी बस यही कहते सुनते रहे, कि दुल्हन अपने ससुराल की देहलीज भी ना चढ़ सकी।

होली पर नहीं होगा पूरी रात धमाल

भास्कर न्यूज & पालीहर साल रंगों के पर्व होली पर पूरी रात होने वाली धमाल इस बार नहीं हो सकती है। तिथियों में घटत—बढ़त व अधिक मास के कारण करीब 19 साल बाद फरवरी में आ रही होली के साथ ही पंचांग में इस बार होलिका दहन का मुर्हूत भी सांझ ढलते ही आ रहा है।रंगों की बरसात,फाल्गुनी माहौल, हंसी—ठिठोली के स्वर तथा मस्ती भरे अंदाज के लिए प्रख्यात होली के पर्व पर धमाल दो दिन पहले ही जिलेभर में शुरुआत हो जाती है। जो होलिका दहन की पूरी रात तथा दूसरे दिन धुलंडी को तो परवान पर पहुंच जाती है। पिछले कुछेक सालों को छोड़े तो हर बार होलिका दहन का मुहूर्त पंचांग के अनुसार रात में ही आता है, इसके चलते पूरी रात को होली की धमचक रहती है। युवा वर्ग तो होली की मस्ती में इस कदर डूबा रहता है ,कि उनको पता ही नहीं चलता कि कब सुबह हो जाती है। पंडित महेंद्र रावल के अनुसार होलाष्टक रविवार को शाम के बाद लग गया है। इसके साथ ही 28 फरवरी रात तक कोई शुभ कार्य नहीं होगा। पूर्णिमा को शाम तक प्रदोषकाल भी रहेगा। होलिका दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त 28 फरवरी को शाम 6.30 बजे से रात 9.07 बजे तक रहेगा। मगर मुहूर्त की शुरुआत में ही दहन अधिक श्रेष्ठ है। इस साल दो वैशाख : भगवान की भक्ति के लिए इस बार दो वैशाख माह आ रहे है। तीन साल बाद आने वाले अधिक मास में पहले वर्ष 2007 में जेठ माह आया था। अधिक मास की शुरूआत 15 अप्रैल से शुरू होगी,जो 14 मई तक रहेगा। अधिक मास में भजन कीर्तन ही करना चाहिए। इस दौरान मांगलिक कार्यो से बचना चाहिए। पंडित दिनेश दिनकर के अनुसार धर्मग्रंथों में यह मास केवल भगवान की भक्ति के लिए होता है। निष्काम भाव से केवल धर्म कार्य,भागवत कथा,श्रवण,तीर्थ सत्संग करने से ही फल प्राप्त होता है। इस मास में सूर्य भगवान को भी नियमित रूप से अध्र्य देने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।19 साल का अजब संयोगफरवरी माह में बरसों बाद होली का संयोग करीब 19 साल बाद आ रहा है। इससे पहले वर्ष 1991 में भी फरवरी माह में ही होलिका दहन हुआ था। अब आगे भी वर्ष 1929 में ही फरवरी माह में हाली आएगी। यानि 19 साल बाद फिर से होली फरवरी में आएगी। जानकारों का कहना है कि तिथियों में क्षय के कारण ऐसा संयोग हो रहा है।

विदेशी बाला के मन भाए ‘बाबा’

विदेशी बाला के मन भाए ‘बाबा’

जोधपुर. योग सिखाने वाले बाबा विदेशी युवती को इतने पसंद आए कि दोनों विवाह के बंधन में बंध गए। दोनों सोमवार को विवाह का पंजीकरण करवाने नगर निगम पहुंचे तो वहां इस जोड़े को देखने मजमा लग गया। बाबा इस युवती के देश जाकर योग का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं। यह बात और है कि कानूनी पेचिदगियों की वजह से उनका विवाह पंजीयन प्रमाण-पत्र नहीं बन सका। उनसे कुछ कागज और मांगे गए हैं। बड़लेश्वर महादेव मंदिर मसूरिया के बाबा मारुति गिरी स्विट्जरलैंड की तानिया उर्फ चन्द्रा के साथ नगर निगम पहुंचे तो वहां हर किसी की नजरें उनको ही देखने लगीं। पचास साल के बाबा और तैतीस साल की विदेशी युवती हाथों में हाथ डाल विवाह पंजीयन शाखा पहुंचे। प्रभारी कुशल जैन को बताया कि उन्होंने 20 जनवरी को आर्य समाज में शादी रचाई है। अब मैरिज सर्टिफिकेट बनवाना चाहते है। उन्होंने शपथ-पत्र और आर्य समाज का मैरिज सर्टिफिकेट पेश किया तो जैन ने उन्हें निगम आयुक्त के पास भेज दिया। आयुक्त ने उनके दस्तावेजों की जांच की। चूंकि मामला विदेशी महिला का देशी बाबा के संग शादी का था, इसलिए उन्होंने कुछ और दस्तावेज मांगे। इस जोड़े ने कहा कि उन्हें स्विट्जरलैंड जाना है। बाबा का पासपोर्ट बनाने के लिए भी एप्लाई किया है। इसके बाद दोनों इंटेलीजेंस विभाग में कानूनी कार्रवाई करने चले गए। दो साल पूर्व मारुति गिरी व तानिया द्वारका में मिले थे। वहां बाबा योग का प्रशिक्षण दे रहे थे। संस्कृति जानने आई थीञ्चयहां की संस्कृति जानने और योग सीखने आई थी। बाबा अच्छे लगे, प्रेम कर बैठी। इनसे हिन्दी व संस्कृत भी सीखी। अब हम योग का प्रचार—प्रसार करना चाहते हैं।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कृषकों का भ्रमण २5 से

बाड़मेर से जयपुर के बीच वोल्वो बस चलेगी
जिला मुख्यालय से राजधानी जयपुर के मध्य शीघ्र ही वोल्वो बस का संचालन किया जाएगा। यह घोषणा यातायात मंत्री बृज किशोर शर्मा ने गुरुवार को की। शर्मा ने बताया कि बाड़मेर में तेल तथा लिग्नाइट के अन्वेषण के पश्चात अति आधुनिक यातायात की सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता है। इसके मद्देनजर शीघ्र ही एक वोल्वो बस चलाई जाएगी। उन्होंने बताया कि बाड़मेर तथा जयपुर के मध्य वर्तमान में भी वातानुकुलित वाहनों का संचालन किया जा रहा

दो साल बाद भी शुरू नहीं हुआ बीएसएनएल टॉवर

दो साल बाद भी शुरू नहीं हुआ बीएसएनएल टॉवर

ग्राम पंचायत मुख्यालय सियाणी में बीएसएनएल का टॉवर स्थापित हुए दो साल हो चुके हैं मगर इसके चालू नहीं होने से उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीण जगदीश जैन,हरी खत्री, संजय जैन, हरीश जांगिड़ व कल्याणसिंह ने बताया कि सियाणी में दो वर्ष पूर्व बीएसएनएल टॉवर स्थापित किया गया था। इस दौरान ग्रामीणों ने बीएसएनएल की सिमें खरीद ली। लेकिन लंबे इंतजार के बाद भी निगम ने दूरसंचार सेवाएं शुरु नहीं की। इस स्थिति में उपभोक्ताओं को निराश होना पड़ रहा है।

हां रे, फागण फरवरियो...

हां रे, फागण फरवरियो...
. सिरोहीहोली के महापर्व को आने में अब सिर्फ सप्ताहभर का समय शेष बचा है। इसके साथ ही इसकी तैयारियां परवान चढ़ चुकी हैं। रंग, अबीर, गुलाल से लेकर रंग-बिरंगी पिचकारियां बाजार में आ चुकी हैं, वहीं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु जन्म पर मनाए जाने वाले एक खास रस्म 'ढूंढणाÓ को लेकर भी बेहद उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ देर रात तक चंग की थाप पर गूंजते फाग जैसे माहौल का मूड एकदम से बासंतिक कर दिया है।सोमवार से होलाष्टक, शुभ कार्यों पर विराम : २२ फरवरी को सूर्योदय होलाष्टक शुरू हो रहा है। इसके बाद सभी शुभ कार्य पर एकबारगी विराम लग जाता है।इसके पीछे मान्यता है कि अब सिर्फ होली की मस्ती में समय बिताया जाए, अन्य कार्यों से अवकाश कर त्योहार का लुत्फ उठाएं। होलाष्टक का समापन होलिका दहन के साथ होता है। वैसे होली की मस्ती शीतला सप्तमी तक रहती है और मजदूर अगता में मस्त पड़े रहते हैं। अगता का मतलब काम-धंधे से अवकाश एवं मस्ती का मूड में सरोबार होना होता है।होलिका दहन से मौसम की भविष्यवाणी : होलिका दहन के समय मौसम की भविष्यवाणी की भी यहां परंपरा रही है। इसमें देखा जाता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटें किस दिशा की ओर जा रही है। जिस दिशा की ओर लपटें जाती हैं, उसके आधार पर भविष्यवाणी की जाती है कि कितनी वर्षा होगी, सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी या सामान्य स्थिति रहेगी। होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी को लोग होलिका की राख को एक-दूसरे पर उछालते हैं और उसके बाद स्नान करते हैं। दोपहर को रंगों की होली खेलने के बाद शाम को लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं।माह भर पहले डंडारोपणरबी की फसल तैयार होने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व होली की उमंग काफी पहले से ही सभी ओर छा जाता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बसंत पंचमी यानि सरस्वती पूजन के अवसर पर गांव व ढाणियों में होलिका दहन के लिए डंडारोपण कर दिया गया, तो उसके साथ अबीर, गुलाल लगाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। डंडे के आसपास जलावन इकट्ठा करने को लेकर बच्चों का उत्साह इस समय चरम पर पहुंच चुका है। वहीं, कहीं चार जने इकट्ठे हुए नहीं कि होली के गीत व चंग की थाप की मस्ती घुलने लगती है।होलकियां तैयार करने में जुटे बच्चेहोली की तैयारियों में होलकियां की बात न की जाए, तो सारी बातें ही अधूरी रह जाएंगी। इसके लिए बच्चे लंबे समय से गोबर इकट्ठा करने से लेकर उसे तैयार करने में लगे हैं। इसमें बच्चे गोबर के छोटे-छोटे उपले बनाते हैं, जिसके बीच में छेद किया रहता है। उपले को पहले सुखाया जाता है, फिर छेद में रस्सी डालकर माला बनाते हैं और उस माला को होलिका पर अर्पित की जाती है। चंूकि इसके लिए समय की जरूरत पड़ती है। ऐसे में बच्चे पहले से ही होलकियां बनाने के साथ उसे सुखा-सुखा कर रख रहे हैं। इसमें बच्चों के बीच अधिक से अधिक होलकियां की माला बनाने की होड़ रहती है।मारवाड़ की विशेष रस्म 'ढूंढणाÓमारवाड़ में होली के अवसर पर एक विशेष रस्म 'ढूंढणाÓ काफी प्रचलित है। इसके तहत जिनके घरों में नवजात शिशु रहते हैं, उनके माता-पिता गेरियों (गेर नाचने वाले) को होलिका दहन के दिन शाम को घर बुलाते हैं और उनसे बच्चों को ढूंढवाते हैं। इसमें बच्चे को उसकी कोई कन्या गोद में लेकर चौकी पर बैठ जाती है और बच्चे को वस्त्र के ऊपर छाया कर देती है। इस बीच गेरिए नाचते हुए उसके ऊपर नृत्य करते हुए डांडिया बजाते हैं, साथ ही आशीर्वचन स्वरूप गीत गाते हैं, 'ढूढू ढूढू ढोकलु, आबा जतरू छोकरू/आज अतरू काले मोटु आबा जतरूÓ। इसके बाद गेरियों को मिठाई व दक्षिणा दिया जाता है। इसको लेकर भी गैर वालों में आमंत्रण देने आदि की तैयारियां जगह-जगह की जा रही है। भंग का रंग जमा हो चकाचकमस्ती का त्योहार होली में भांग का अलग ही महत्व है। इस दिन ऐसे कई लोग हैं जो भले ही कभी भांग न पीते हों, लेकिन इस दिन जरूर पीते हैं। लोग एक-दूसरे का मनुहार भी करते हैं। सो इस बार भंग का रंग जमा हो चकाचक... के लिए दुकानदारों ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। वे इसके लिए आर्डर देने से लेकर मंगवाने में जुटे हैं। वैसे जिनके यहां इस बार शादी-विवाह आदि हुए हैं, उनमें से कई अभी से भांग का आर्डर दे चुके हैं। होलिका दहन का मुहूर्तज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे के अनुसार इस बार होलिका दहन का मुहूर्त फाल्गुन पूर्णिमा रविवार को सायं काल प्रदोष वेला में ६.३४ बजे से ८.४५ बजे तक है। इस बार भद्रा दिन में ११.५९ बजे रहने से होलिका दहन प्रदोष वेला में शुभ रहेगा।

कोयल गाती नहीं...गाता है

कोयल गाती नहीं...गाता है
Matrix News
भास्कर न्यूज . सिरोहीनर्सरी क्लास के बच्चों से लेकर कवियों, संगीतकारों के प्रिय पक्षी कोकिल के दीवाने सामान्य तौर पर यही जानते हैं कि काली कोयल बोल रही है, डाल-डाल पर डोल रही है, कूक कूक का गीत सुनाती...। लेकिन, यदि पक्षी विशेषज्ञों से बात करें तो वे तत्काल आपको बताएंगे कि कोयल गाती नहीं, बल्कि गाता है। दरअसल, मादा कोयल कभी उस तरह से नहीं गाती, नर कोकिल ही उतनी प्यारी आवाज में गाता है, जिसे सुनकर हर कोई आह्वालित होता है। वैसे, कोयल के बारे में जानना अपने आप में रोचक है लेकिन इसके साथ जरूरी है उनकी सुरक्षा। घनी अमराइयां उनके आवास हैं, जिनका पिछले दिनों काफी ह्रास हुआ है। शेष & पेज 9और यदि इस मीठी तान को सुनना है, तो उन अमराइयों, घने पेड़ों को बचाने के साथ लगाना होगा, जो इनके पसंदीदा बसेरा हैं।लगाने होंगे छायादार, सदाहरित पौधे : उदयपुर से सिरोही आने वाले मार्ग के साथ सिरोही माउंट आबू मार्ग, माउंट के आसपास पहले खूब अमराइयों का विशेष क्षेत्र है, जहां ये खूब रहते हैं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से सड़क निर्माण से लेकर कई अन्य कारणों से छायादार पेड़ खूब धराशायी हुए हैं और उसके साथ इनके आवास उजड़ते जा रहे हैं। अब यदि आवाज के दीवाने इस पक्षी की हिफाजत चाहते हैं तो पहले जरूरी है कि अमराइयों के विनाश को रोककर नए पेड़ उस तरह के लगाए जाएं। होता यह है कि आम, जामुन आदि छायादार पेड़ काटे तो खूब जा रहे हैं, लेकिन नए पेड़ लगाए नहीं जा रहे हैं। जो पौधे लगाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश विदेशी प्रजाति के वे पौधे हैं, जो इन पक्षियों का बसेरा होता ही नहीं है। इसीलिए जरूरी है कि इस तरह के वृक्षों के पौधे भी लगाए जाएं।ग्रीष्मकालीन प्रवास : अपने देश में प्रवासी पक्षी सामान्य तौर पर शीतकाल में प्रवास करते हैं, लेकिन कोयल के साथ ठीक उल्टा है। यह ग्रीष्मकाल में अपने यहां प्रवास करने को पहुंचता है। इसे ठंड बर्दाश्त नहीं है और उससे बचने के लिए वह दक्षिण की ओर प्रस्थान कर जाता है। आम तौर पर यह अंतर्देशीय अर्थात अपने देश के भीतर ही प्रवास करता है, लेकिन कभी-कभार इसे प्रवास पर आस्ट्रेलियाई कंट्रीज में भी देखा गया है। बसंत व ग्रीष्म ऋतु इसका प्रजनन काल है, जिसमें नर मादा को रिझाने के लिए मीठी आवाज में गाता है। सामान्य तौर पर जब आम में बौर आना शुरू होते हैं और छोटी-छोटी अमियां दिखने लगती हैं, तो इसकी आवाज सुनाई देने लगती है। यह सर्वहारी जीव फल के साथ कीड़े-मकोड़े भी बड़े मजे से खाता है।स्वभाव से संकोची, नीड़ निर्माण से मतलब नहींराजपुताना सोसायटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री, राजस्थान के सलाहकार सत्यप्रकाश मेहरा के अनुसार कोयल कुक्कू कुल का पक्षी है, जिसका वैज्ञानिक नाम यूडाइनेमिस स्कोलोपेकस स्कोलोपेकस है। नर कोयल नीलापन लिए काला होता है, तो मादा तीतर की तरह धब्बेदार चितकबरी होती है। नर कोयल ही गाता है। उसकी आंखें लाल व पंख पीछे की ओर लंबे होते हैं। नीड़ परजीविता इस कुल के पक्षियों की विशेष नेमत है यानि ये अपना घोसला नहीं बनाती। ये दूसरे पक्षियों विशेषकर कौओं के घोंसले के अंडों को गिरा कर अपना अंडा उसमें रख देती है। स्वभाव से संकोची यह पक्षी कभी किसी के सामने पडऩे से कतराता है। इस वजह से इनका प्रिय आवास या तो आम के पेड़ हैं या फिर मौलश्री के पेड़ अथवा कुछ इसी तरह के सदाबहार घने वृक्ष, जिसमें ये अपने आपको छिपाए हुए तान छेड़ता है।