गुरुवार, 25 अगस्त 2011

कोई नाक पे रखा चश्मा तो है नहीं

तुम सोचती होगी
कि मेरा बुखार उतर गया होगा
तुम्हारा सोचना वाजिब भी है
पिछले आठ महीनों से मैंने तुम्हें फोन जो नहीं किया
और ना ही जन्मदिन की बधाई दी
या नव-वर्ष की

लेकिन
शायद तुम यह नहीं जानती
कि जब दर्द हद से गुज़र जाता है
तो दर्द ही दवा बन जाता है

अब मुझे
न तुम्हारी
न तुम्हारी आवाज़ की
न तुम्हारी तस्वीर की
किसी की भी ज़रूरत नहीं है

अब मैं हूँ तुम
और तुम हो मैं

सुबह से लेकर शाम तक
शाम से लेकर सुबह तक
तुम
हर पल
मेरे साथ हो

हाँ, बाबा, हाँ
सच, और पूरा सच
देखो,
तुम्हारा अहसास
कोई नाक पे रखा चश्मा तो है नहीं
कि रात को सोते वक़्त उसे उतार के रख दूँ!

और हाँ
मैं तुम्हें भूला नहीं
और न ही भूला सकता हूँ
लेकिन गाहे-बगाहे फिर भी याद ज़रूर कर लेता हूँ
उस बुद्धू की तरह
जो चश्मा पहने हुए है
फिर भी चश्मा ढूँढता रहता है

फिर क्यूँ यारो हम हैं सोते चलो लगाते जोर है

गली-गली में शोर है
नेता सारे चोर हैं
करने को हम कुछ नहीं करते
बस देते देश छोड़ है

आज मिला है एक सुअवसर हमको
आज हो रही भोर है
फिर क्यूँ यारो हम हैं सोते
चलो लगाते जोर है

धरना-अनशन क्या कर लेगा
कहते कुछ मुँहजोर हैं
उनसे हमें हैं बस इतना कहना
यह शस्त्र बड़ा बेजोड़ है

गाँधी ने हमें दी आज़ादी
अब आया हमारा दौर है
फिर क्यूँ यारो हम हैं सोते
चलो लगाते जोर है

करने से ही कुछ होता यारो
क्यूँ ना करने की होड़ है
कर्म किए जाकर्म किए जा
यहीं गीता का निचोड़ है

जब जब जनता एक हुई है
हुआ नतीजा पुरजोर है
फिर क्यूँ यारो हम हैं सोते
चलो लगाते जोर है

झाड़-फानूस के कमरों में



पि -आर है मगर प्यार नहीं
पोर्ट्रैट है मगर परिवार नहीं
झाड़-फानूस के कमरों में
बच्चों की किलकार नहीं
शिरडी में लाखों दे देंगे
लेकिन भाई को देंगे हज़ार नहीं
झाड़-फानूस के कमरों में
अपनों से सरोकार नहीं
अपनी सामर्थ्य का दम भरते हैं
सुनते किसी की बात नहीं
झाड़-फानूस के कमरों में
संतों का सत्कार नहीं
मरता है कोई तो मरने दो
इनका ये संग्राम नहीं
झाड़-फानूस के कमरों में
चढ़ता किसी को बुखार नहीं

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

राजस्थान और हरयाणा का प्रमुख पेय है राबड़ी

राबड़ी राजस्थान और हरयाणा का प्रमुख पेय है जो कि काफी लोकप्रिय और सस्ता भी है और स्थानीय रूप से आसानी से तैयार हो जाता है. राबड़ी कोई बियर का नया ब्रांड नही है. ये एक अमृत है गर्मी से निजाद पाने के लिए. राबड़ी राजस्थन में जहा 45-50 डिग्री तापमान रह्ता है वहां ये वरदान है. लू के थपेड़ों में भी लोग इसको पी कर दोपहर में आराम से सोते है. यह गरमी के मौसम में अधिक प्रयोग की जाती है. जो पहली बार राबड़ी पिएगा, एक गिलास मे बेहोश नींद में सो जाएगा. आजकल राबड़ी पाँच सितारा होटलों मे भी उपलब्ध है और विदेशी पर्यटक बड़े चाव से राबड़ी का लुत्फ उठा रहे है. इस राबडी के साथ बाजरे की रोटी चूर कर खा सकते हैं या ठंडी राबडी में छाछ या दही और जीरा मिलाकर पी सकते हैं.

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राबड़ी के फायदे ही फायदे हैं:-
* यह तनाव कम कम करती
* इससे नींद अच्छी आती है
* कभी लू नही लगती है
* ब्लड प्रेशर नही होता है
* अस्थमा में भी लाभदायक है
* भूक अच्छी लगती है
* पेट की हर बिमारी में लाभ दायक है
* यह पथरी रोग ठीक करती है

मंगलवार, 18 मई 2010

मां-बेटी के दुखद आंकडे


देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं को लेकर जनगणना-2001 के आंकडे चौंकाने वाले रहे थे। ये आंकडे आज भी इतने चिन्ताजनक हैं कि इन पर तुरन्त और नियमित रूप से ध्यान देने की जरूरत है। हम पिछली जनगणना की रोशनी में देखें, तो आंखें खोलने वाले और आघात पहुंचाने वाले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-
पहला तथ्य :
शिशु लिंगानुपात पिछले 40 सालों में काफी गिरावट की ओर अग्रसर है। हमारे देश में 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में वर्ष 1961 में 1000 लडकों पर 976 लडकियां थीं। इसमें लगातार गिरावट जारी रही। 1971 में यह आंकडा 964, 1981 में 962, 1991 में 945 था और 2001 में तो 927 पर पहुंच गया।
दूसरा तथ्य :
ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में लिंग चयन ज्यादा किया जा रहा है। आंकडे दर्शाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 लडकों पर 946 लडकियां थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 900 ही थी।
तीसरा तथ्य :
शिक्षित परिवारों में अशिक्षित परिवारों की अपेक्षा गर्भपात के आंकडे अधिक रहे। स्नातक और इससे ऊपर शिक्षित महिलाओं द्वारा जन्म दिए 1000 बच्चों में से बालिकाओं की संख्या 876 ही रही, जबकि अशिक्षित या अल्प शिक्षित महिलाओं में यह संख्या 920 रही।
चौथा तथ्य :
धार्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो ईसाइयों की स्थिति सबसे अच्छी है। ईसाइयों में 1000 लडकों में से 964 लडकियां, मुस्लिमों में 950, बौद्धों में 942, हिन्दुओं में 925 और जैनियों में यह संख्या 870 है। सबसे बुरी स्थिति सिखों की है, जहां यह अनुपात 786 का ही था।
पांचवां तथ्य :
राष्ट्रीय औसत और राज्य व केन्द्रशासित प्रदेशों के आंकडे भी आंखें खोलने वाले हैं। वर्ष 2001 में लिंग अनुपात का राष्ट्रीय औसत 1000 : 927 था, जबकि महाराष्ट्र में यह अनुपात 913, राजस्थान में 906, हिमाचल प्रदेश में 897, गुजरात में 878, दिल्ली में 863, हरियाणा में 820, पंजाब में 793 था। चंडीगढ में यह अनुपात 745 का रहा, जो सबसे कम है।
छठा तथ्य :
विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले दस देशों में भारत की स्थिति काफी दयनीय रही। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा प्राप्त वर्ष 2009 के आंकडों के अनुसार, रूस में 1000 लडकों पर 1164, जापान में 1053, ब्राजील में 1031, अमरीका में 1023, इंडोनेशिया में 1003, नाइजीरिया में 995, बांग्लादेश में 978 और पाकिस्तान में 942 लडकियां थीं। भारत में यह अनुपात 936 का था। चीन प्रति हजार लडकों पर 927 लडकियों की संख्या के साथ सबसे नीचे पायदान पर था। इतना ही पर्याप्त नहीं है। एक स्वयंसेवी संगठन सेव द चिल्ड्रेन ने माताओं की स्थिति का सर्वे करते हुए एक रिपोर्ट कुछ ही दिन पहले जारी की है। मां बनने के अनुकूल परिप्रेक्ष्य में मध्य आय वर्ग के 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो मां बनने के लिए भारत सुरक्षित जगह नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों और उन्हें जन्म देने वाली माताओं की कुल मौतों की दो तिहाई संख्या अकेले भारत की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध उनके शैक्षणिक और सामाजिक-आर्थिक स्तर से जुडा है। हजारों महिलाओं की मौत सिर्फ इस वजह से हो जाती है कि उन्हें प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं। यदि मिलती भी हैं, तो उसकी गुणवत्ता नगण्य ही होती है। भारत में जहां बालिकाओं का अनुपात गिरावट की ओर है, वहीं मां बनने के लिए भी भारत सुरक्षित स्थान नहीं रहा। इस सबके बाद भी भारत के निवासी श्रद्धा के साथ देवियों की पूजा शक्ति, धन, स्वास्थ्य, विद्या, रक्षा, समृद्घि, शांति की अधिष्ठात्रि के रूप में करते हैं। यह पाखण्ड और ढोंग की चरमसीमा है। समस्या तो यह है कि पुरूषों और महिलाओं को यह सब विरासत में मिला हुआ है और उनकी सोच में जमा हुआ है। इसे बदलने की जरूरत है अन्यथा आने वाले समय में यह हमेशा हमारे समाज को हानि पहुंचाता रहेगा। सामाजिक संतुलन न होने से महिलाओं के खिलाफ अपराध बढेंगे। साथ ही, सामाजिक हिंसा का प्रतिशत भी बढेगा। खबरेंं हैं कि आयातित पत्नियों और साझा पत्नियों की ओर रूझान बढा है। मानव तस्करी की प्रवृत्ति भी बढी है।भारत में ऎसे अनेक कानून हैं, जिनका क्रियान्वयन नहीं होता है। जब हर कोई दहेज ले और दे रहा हो, तो कौन शिकायतकर्ता बने और कौन आरोपी और साक्ष्य कहां हैं कौन बयान देगा और बाद में अपने बयान से नहीं पलटेगा चूंकि कोई दण्ड नहीं है, इसलिए पाप सामाजिक चलन में शामिल हो गया है। एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि दहेज की प्रथा के चलते हम पुत्र को ही संतान के रूप में वरीयता देते हैं। हमें यह डर भी सताता रहता है कि जायदाद का हस्तान्तरण करना पडेगा, क्योंकि पुत्रियों को प्रवासी पक्षी के रूप में देखा जाता है। जो लोग समाज की इस चिन्ताजनक परिस्थितियों को बदलने में सक्षम हैं, उनका नैतिक दायित्व और कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आएं और काम करें। इस काम में सर्वाधिक भूमिका माता-पिता निभा सकते हैं। पुरूष और महिलाएं भी शिक्षा समेत विविध क्षेत्र में अगुवाई कर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए हालात बदल सकते हैं। भारत में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। यदि स्थितियां न बदली गई, तो युवाओं का भविष्य गम्भीर रूप से विकृत हो जाए
मां-बेटी के दुखद आंकडे


12 मई 2010, 09:26 hrs IST ईमेल
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देश की आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं को लेकर जनगणना-2001 के आंकडे चौंकाने वाले रहे थे। ये आंकडे आज भी इतने चिन्ताजनक हैं कि इन पर तुरन्त और नियमित रूप से ध्यान देने की जरूरत है। हम पिछली जनगणना की रोशनी में देखें, तो आंखें खोलने वाले और आघात पहुंचाने वाले कुछ तथ्य इस प्रकार हैं :-



पहला तथ्य : शिशु लिंगानुपात पिछले 40 सालों में काफी गिरावट की ओर अग्रसर है। हमारे देश में 0-6 वर्ष के आयु वर्ग में वर्ष 1961 में 1000 लडकों पर 976 लडकियां थीं। इसमें लगातार गिरावट जारी रही। 1971 में यह आंकडा 964, 1981 में 962, 1991 में 945 था और 2001 में तो 927 पर पहुंच गया।

दूसरा तथ्य : ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में लिंग चयन ज्यादा किया जा रहा है। आंकडे दर्शाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में 1000 लडकों पर 946 लडकियां थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह संख्या 900 ही थी।



तीसरा तथ्य : शिक्षित परिवारों में अशिक्षित परिवारों की अपेक्षा गर्भपात के आंकडे अधिक रहे। स्नातक और इससे ऊपर शिक्षित महिलाओं द्वारा जन्म दिए 1000 बच्चों में से बालिकाओं की संख्या 876 ही रही, जबकि अशिक्षित या अल्प शिक्षित महिलाओं में यह संख्या 920 रही।



चौथा तथ्य : धार्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो ईसाइयों की स्थिति सबसे अच्छी है। ईसाइयों में 1000 लडकों में से 964 लडकियां, मुस्लिमों में 950, बौद्धों में 942, हिन्दुओं में 925 और जैनियों में यह संख्या 870 है। सबसे बुरी स्थिति सिखों की है, जहां यह अनुपात 786 का ही था।



पांचवां तथ्य : राष्ट्रीय औसत और राज्य व केन्द्रशासित प्रदेशों के आंकडे भी आंखें खोलने वाले हैं। वर्ष 2001 में लिंग अनुपात का राष्ट्रीय औसत 1000 : 927 था, जबकि महाराष्ट्र में यह अनुपात 913, राजस्थान में 906, हिमाचल प्रदेश में 897, गुजरात में 878, दिल्ली में 863, हरियाणा में 820, पंजाब में 793 था। चंडीगढ में यह अनुपात 745 का रहा, जो सबसे कम है।



छठा तथ्य : विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाले दस देशों में भारत की स्थिति काफी दयनीय रही। संयुक्त राष्ट्र सचिवालय के आर्थिक व सामाजिक मामलों के विभाग के जनसंख्या प्रभाग द्वारा प्राप्त वर्ष 2009 के आंकडों के अनुसार, रूस में 1000 लडकों पर 1164, जापान में 1053, ब्राजील में 1031, अमरीका में 1023, इंडोनेशिया में 1003, नाइजीरिया में 995, बांग्लादेश में 978 और पाकिस्तान में 942 लडकियां थीं। भारत में यह अनुपात 936 का था। चीन प्रति हजार लडकों पर 927 लडकियों की संख्या के साथ सबसे नीचे पायदान पर था।



इतना ही पर्याप्त नहीं है। एक स्वयंसेवी संगठन सेव द चिल्ड्रेन ने माताओं की स्थिति का सर्वे करते हुए एक रिपोर्ट कुछ ही दिन पहले जारी की है। मां बनने के अनुकूल परिप्रेक्ष्य में मध्य आय वर्ग के 77 देशों में भारत का स्थान 73वां है। दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो मां बनने के लिए भारत सुरक्षित जगह नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों और उन्हें जन्म देने वाली माताओं की कुल मौतों की दो तिहाई संख्या अकेले भारत की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं के स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध उनके शैक्षणिक और सामाजिक-आर्थिक स्तर से जुडा है। हजारों महिलाओं की मौत सिर्फ इस वजह से हो जाती है कि उन्हें प्राथमिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पातीं। यदि मिलती भी हैं, तो उसकी गुणवत्ता नगण्य ही होती है। भारत में जहां बालिकाओं का अनुपात गिरावट की ओर है, वहीं मां बनने के लिए भी भारत सुरक्षित स्थान नहीं रहा। इस सबके बाद भी भारत के निवासी श्रद्धा के साथ देवियों की पूजा शक्ति, धन, स्वास्थ्य, विद्या, रक्षा, समृद्घि, शांति की अधिष्ठात्रि के रूप में करते हैं। यह पाखण्ड और ढोंग की चरमसीमा है। समस्या तो यह है कि पुरूषों और महिलाओं को यह सब विरासत में मिला हुआ है और उनकी सोच में जमा हुआ है। इसे बदलने की जरूरत है अन्यथा आने वाले समय में यह हमेशा हमारे समाज को हानि पहुंचाता रहेगा। सामाजिक संतुलन न होने से महिलाओं के खिलाफ अपराध बढेंगे। साथ ही, सामाजिक हिंसा का प्रतिशत भी बढेगा। खबरेंं हैं कि आयातित पत्नियों और साझा पत्नियों की ओर रूझान बढा है। मानव तस्करी की प्रवृत्ति भी बढी है।



भारत में ऎसे अनेक कानून हैं, जिनका क्रियान्वयन नहीं होता है। जब हर कोई दहेज ले और दे रहा हो, तो कौन शिकायतकर्ता बने और कौन आरोपी और साक्ष्य कहां हैं कौन बयान देगा और बाद में अपने बयान से नहीं पलटेगा चूंकि कोई दण्ड नहीं है, इसलिए पाप सामाजिक चलन में शामिल हो गया है। एक महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि दहेज की प्रथा के चलते हम पुत्र को ही संतान के रूप में वरीयता देते हैं। हमें यह डर भी सताता रहता है कि जायदाद का हस्तान्तरण करना पडेगा, क्योंकि पुत्रियों को प्रवासी पक्षी के रूप में देखा जाता है। जो लोग समाज की इस चिन्ताजनक परिस्थितियों को बदलने में सक्षम हैं, उनका नैतिक दायित्व और कर्तव्य है कि वे इस दिशा में आगे आएं और काम करें। इस काम में सर्वाधिक भूमिका माता-पिता निभा सकते हैं। पुरूष और महिलाएं भी शिक्षा समेत विविध क्षेत्र में अगुवाई कर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए हालात बदल सकते हैं। भारत में युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। यदि स्थितियां न बदली गई, तो युवाओं का भविष्य गम्भीर रूप से विकृत हो जाए

शनिवार, 1 मई 2010

ग्रामीण क्षेत्रों में चारे के भाव आसमान छू रहे।


रानीवाडा .बारिश की कमी व चारे की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में चारे के भाव आसमान छू रहे हैं। ज्वार की कुट्टी गेहूं से भी महंगी हो गई है। ज्वार की कुट्टी तो चारा डिपो से गायब सी हो गई है। ऐसे में काश्तकार पशुओं को खाखला खिला रहे हैं। ज्वार की कुट्टी मध्यप्रदेश से आ रही है। ब्यावर, किशनगढ़ व केकड़ी क्षेत्र में इसके भाव 1275 से 1300 रुपए क्विंटल हैं। गेहूं के भाव राशन की दुकानों पर एपीएल फ्रीसेल तक 1250 रुपए क्विंटल हैं। एपीएल में भी रेग्यूलर व स्पेशल की दर इससे भी कम है लेकिन काश्तकार पशुओं की सेहत के लिए मजबूरन ज्वार की कुट्टी भी खिला रहे हैं। हालांकि चारा महंगा होने के कारण अधिसंख्य काश्तकार ज्वार की कुट्टी खरीद ही नहीं पा रहे, वे पशुओं को खाखला (भूसा) खिला रहे हैं। दूध की मात्रा बढ़ाने के लिए काश्तकार खाखले में डेयरी का पशु आहार मिला रहे हैं। झालावाड़ व कोटा से आने वाले खाखले में सिर्फ 130 रुपए क्विंटल की सब्सिडी होने के कारण काश्तकार मध्यप्रदेश से आने वाला खाखला ही खरीद रहे हैं। इस पर दो सौ रुपए क्विंटल की सब्सिडी है। मध्यप्रदेश से आने वाली ज्वार की कुट्टी पर सौ रुपए क्विंटल की सब्सिडी भी बंद कर दी गई है।