शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

हां रे, फागण फरवरियो...

हां रे, फागण फरवरियो...
. सिरोहीहोली के महापर्व को आने में अब सिर्फ सप्ताहभर का समय शेष बचा है। इसके साथ ही इसकी तैयारियां परवान चढ़ चुकी हैं। रंग, अबीर, गुलाल से लेकर रंग-बिरंगी पिचकारियां बाजार में आ चुकी हैं, वहीं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु जन्म पर मनाए जाने वाले एक खास रस्म 'ढूंढणाÓ को लेकर भी बेहद उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ देर रात तक चंग की थाप पर गूंजते फाग जैसे माहौल का मूड एकदम से बासंतिक कर दिया है।सोमवार से होलाष्टक, शुभ कार्यों पर विराम : २२ फरवरी को सूर्योदय होलाष्टक शुरू हो रहा है। इसके बाद सभी शुभ कार्य पर एकबारगी विराम लग जाता है।इसके पीछे मान्यता है कि अब सिर्फ होली की मस्ती में समय बिताया जाए, अन्य कार्यों से अवकाश कर त्योहार का लुत्फ उठाएं। होलाष्टक का समापन होलिका दहन के साथ होता है। वैसे होली की मस्ती शीतला सप्तमी तक रहती है और मजदूर अगता में मस्त पड़े रहते हैं। अगता का मतलब काम-धंधे से अवकाश एवं मस्ती का मूड में सरोबार होना होता है।होलिका दहन से मौसम की भविष्यवाणी : होलिका दहन के समय मौसम की भविष्यवाणी की भी यहां परंपरा रही है। इसमें देखा जाता है कि होलिका दहन के समय आग की लपटें किस दिशा की ओर जा रही है। जिस दिशा की ओर लपटें जाती हैं, उसके आधार पर भविष्यवाणी की जाती है कि कितनी वर्षा होगी, सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी या सामान्य स्थिति रहेगी। होलिका दहन के अगले दिन धुलंडी को लोग होलिका की राख को एक-दूसरे पर उछालते हैं और उसके बाद स्नान करते हैं। दोपहर को रंगों की होली खेलने के बाद शाम को लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं।माह भर पहले डंडारोपणरबी की फसल तैयार होने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व होली की उमंग काफी पहले से ही सभी ओर छा जाता है। हर वर्ष की तरह इस बार भी बसंत पंचमी यानि सरस्वती पूजन के अवसर पर गांव व ढाणियों में होलिका दहन के लिए डंडारोपण कर दिया गया, तो उसके साथ अबीर, गुलाल लगाने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। डंडे के आसपास जलावन इकट्ठा करने को लेकर बच्चों का उत्साह इस समय चरम पर पहुंच चुका है। वहीं, कहीं चार जने इकट्ठे हुए नहीं कि होली के गीत व चंग की थाप की मस्ती घुलने लगती है।होलकियां तैयार करने में जुटे बच्चेहोली की तैयारियों में होलकियां की बात न की जाए, तो सारी बातें ही अधूरी रह जाएंगी। इसके लिए बच्चे लंबे समय से गोबर इकट्ठा करने से लेकर उसे तैयार करने में लगे हैं। इसमें बच्चे गोबर के छोटे-छोटे उपले बनाते हैं, जिसके बीच में छेद किया रहता है। उपले को पहले सुखाया जाता है, फिर छेद में रस्सी डालकर माला बनाते हैं और उस माला को होलिका पर अर्पित की जाती है। चंूकि इसके लिए समय की जरूरत पड़ती है। ऐसे में बच्चे पहले से ही होलकियां बनाने के साथ उसे सुखा-सुखा कर रख रहे हैं। इसमें बच्चों के बीच अधिक से अधिक होलकियां की माला बनाने की होड़ रहती है।मारवाड़ की विशेष रस्म 'ढूंढणाÓमारवाड़ में होली के अवसर पर एक विशेष रस्म 'ढूंढणाÓ काफी प्रचलित है। इसके तहत जिनके घरों में नवजात शिशु रहते हैं, उनके माता-पिता गेरियों (गेर नाचने वाले) को होलिका दहन के दिन शाम को घर बुलाते हैं और उनसे बच्चों को ढूंढवाते हैं। इसमें बच्चे को उसकी कोई कन्या गोद में लेकर चौकी पर बैठ जाती है और बच्चे को वस्त्र के ऊपर छाया कर देती है। इस बीच गेरिए नाचते हुए उसके ऊपर नृत्य करते हुए डांडिया बजाते हैं, साथ ही आशीर्वचन स्वरूप गीत गाते हैं, 'ढूढू ढूढू ढोकलु, आबा जतरू छोकरू/आज अतरू काले मोटु आबा जतरूÓ। इसके बाद गेरियों को मिठाई व दक्षिणा दिया जाता है। इसको लेकर भी गैर वालों में आमंत्रण देने आदि की तैयारियां जगह-जगह की जा रही है। भंग का रंग जमा हो चकाचकमस्ती का त्योहार होली में भांग का अलग ही महत्व है। इस दिन ऐसे कई लोग हैं जो भले ही कभी भांग न पीते हों, लेकिन इस दिन जरूर पीते हैं। लोग एक-दूसरे का मनुहार भी करते हैं। सो इस बार भंग का रंग जमा हो चकाचक... के लिए दुकानदारों ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। वे इसके लिए आर्डर देने से लेकर मंगवाने में जुटे हैं। वैसे जिनके यहां इस बार शादी-विवाह आदि हुए हैं, उनमें से कई अभी से भांग का आर्डर दे चुके हैं। होलिका दहन का मुहूर्तज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे के अनुसार इस बार होलिका दहन का मुहूर्त फाल्गुन पूर्णिमा रविवार को सायं काल प्रदोष वेला में ६.३४ बजे से ८.४५ बजे तक है। इस बार भद्रा दिन में ११.५९ बजे रहने से होलिका दहन प्रदोष वेला में शुभ रहेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें