शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई.............

वचनाराम देवासी सामरानी
म्हारी सवा लाख री लुंब,गूम गई ईंदानी ...........!राजस्थानी लोकगीत की यह पंक्तिया अब मात्र गुनगुनाते तक सिमित रह गई है!पनिहारी के सिर पर शोभित होने वाला मुकुट ईंदानी अब बीते जमाने की बात बन कर रह गई है!आजकल की युवतियो को ईंदानी की जानकारी ही नहीं है!क्योकि आज न तो पनघट है,और न ही पनिहारी तो फिर ईंदानी किस कम की!विज्ञानं के युग में घर-घर में नल व हैंडपंप लगे होने के कारण घर से बहार कोई पानी भरने की परम्परा ही खत्म हो गई है!जिस जमाने ईंदानी का रिवाज था उस समय बेटी की दहेज में अवश्य दी जाती है!राजस्थान के मारवाड़ अंचल में पानी पानी से भरे घड़े को सिर पर उठाने के लिए ईंदानी बढिया उपकरण हुआ करती थी!

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