सोमवार, 8 मार्च 2010

पलों में मिट गया पीढ़ियों का अंधेरा

बाड़मेर. सूजी देवी ने छह साल पहले बेटे को जन्म तो दिया लेकिन उसकी सूरत देख नहीं सकी, क्योंकि वह जन्म से मोतियाबिंद की शिकार थी। उसकी पीड़ा तब और बढ़ गई जब उसे पता चला कि जिसे उसने जन्म दिया है, उसे भी मोतियाबिंद है, लेकिन कहते हैं कि जो पीड़ा देता है, वही उसे दूर भी करता है। बाड़मेर जिले की चाडों की ढाणी के जगताराम की झोली खुशियों से और उसकी पत्नी व बेटे की जिंदगी अनगिनत रंगों से भर गई। अब सूजी देवी और उसका छह साल का बेटा दोनों ही जान गए हैं कि आकाश नीला होता है और गुलाब कई रंगों का होता है। पैरों में गांठों की वजह से विकलांग जगताराम ने जीवन में परेशानियां झेलीं।उसने कुछ साल पहले मोतियाबिंद के कारण अंधेरों में जीने वाली सूजी देवी से विवाह कर उसका जीवन संवारने का फैसला किया। सूजी के पिता भी जन्म से मोतियाबिंद के शिकार थे। छह साल पहले सूजी ने बालाराम को जन्म दिया तो जगताराम और सूजी दोनों ही दुखों के सागर में डूब गए क्योंकि बालाराम भी मोतियाबिंद का शिकार निकला। मां और बेटा एक दूसरे की सूरत तक नहीं देख पाए। जीवन अपनी गति से चल रहा था कि पिछले दिनों नेत्र ज्योति अस्पताल में नेत्र चिकित्सा शिविर लगा। इसमें पालनपुर से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों को सूजी और बालाराम की आंखों में छिपी रोशनी की किरणों दिखाई दीं। डॉ. रामलाल, डॉ. दक्षेस मोदी और बाड़मेर के डॉ. डीके स्वर्णकार ने इन मां-बेटे की आंखों का ऑपरेशन किया। शनिवार को दोनों की पट्टी खोली गई तो सभी खुशी से उछल पड़े। सूजी ने अपने लाल और उसके पिता को देखा तो उसकी आंखें गीली हो गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकता नहीं
जागरूकता के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मोतियाबिंद का इलाज कराने आगे नहीं आते। जन्म से ही मोतियाबिंद के शिकार मां और बेटा अब दुनिया देख सकेंगे।

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