मारवाड़। हैती की राजधानी पोर्ट ओ प्रिंस में पानी पीते ये हैं अन्ना जिजि। यह कोई साधारण नहीं बल्कि मौत को मात देने वाला व्यक्ति है। गत सप्ताह यहां आए जबरदस्त भूकंप में जिजि अपने घर के मलबे में दब गए। ..और एक सप्ताह बाद राहत व बचावकर्मियों ने इन्हें बाहर निकाला। वह भी सही सलामत।
घणै मान अर घणै हेत सूं मिजमानी करां आपरी ,पधारो म्हारे देश |अठै थानै मिलसी नई अर पुराणी बातां ब्लॉग जगत री, तकनीक ,संगीत अर खान पान री |
शनिवार, 27 मार्च 2010
शनिवार, 20 मार्च 2010
कैसे बीतेंगे दो वैशाख!
रानीवाडा । अभी तो चैत्र है, लोग ज्येष्ठ की दुपहरी की कल्पना मात्र से चिंता में है। ज्येष्ठ तो आएगा तब आएगा, उससे पहले दो वैशाख कैसे गुजरेंगे! भारतीय महीनों के चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ ग्रीष्मकाल में शुमार माने जाते हैं। आषाढ आते-आते आसमान में बादलों की उपस्थिति राहत के संकेत लेकर आती है। इसके बाद सावन का महीना बरखा बहार का होता है। अगर इस आधार पर गणना करें तो इस बार चार के बजाय पांच माह गर्मी के होंगे। इसका कारण है कि इस बार वैशाख दो हैं। शुद्ध वैशाख 31 मार्च से शुरू होगा। इसके बाद 15 अप्रेल से 14 मई तक अघिक वैशाख [पुरूषोत्तम मास] रहेगा। फिर शुद्ध वैशाख 27 मई को खत्म होगा। 28 से चलने वाला ज्येष्ठ मास 26 जून तक तथा इसके बाद आषाढ 26 जुलाई तक रहेगा। अगर बादलों ने इस बार जल्दी रूख नहीं किया तो अघिक वैशाख के कारण गर्मी ज्यादा दिन झेलनी पडेगी। शुक्रवार भी तपा: शुक्रवार को भी गुरूवार की तरह दिन का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस पर ही रहा। गुरूवार रात का तापमान 22.2 डि.से. दर्ज किया गया जो बुधवार रात के तापमान के करीब था। ऎसे में दिन भर तपन रही। घरों में अब पंखों के साथ कूलर भी चलने लगे हैं। कार्यालयों में एसी. शुरू हो गए हैं। बाजारों में कूलर की मांग बढ गई है।
अस्तित्व खो रही कलात्मक छतरियां
रानीवाडा 1 कस्बे के उत्तर दिशा में पहाडी के ऊपर पूर्व ठिकाने के जागीरदारों की शमशान भूमि में निर्मित ऎतिहासिक एवं कलात्मक छतरियों की देखभाल नहीं होने के कारण ये छतरियां ध्वस्त होकर खंडहर के रूप में तब्दील हो रही हैं।
ऎतिहासिक पहाडी पर सतियों के देवल के नाम से भव्य एवं कलात्मक छतरियां यहां आने वाले देशी विदेशी पर्यटकों को दूर से ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सैकडों वर्ष पुरानी इन छतरियों के देखरेख के अभाव में ये धीरे धीरे क्षतिग्रस्त होकर खंडहर के रूप में बदल रही हंै। कई छतरियां तो अपना अस्तित्व भी खो चुकी है। जिसके खम्भे, चौकियां, छ"ो व कमानीदार दरवाजे वहां टूटे हुए व बिखरे हुए पडे हैं। ये छतरियां स्थानीय पूर्व जागीरदारों व चंपावत वंशीय राजपूतों के शमशान में स्थित हंै, जो इन्हीं के पूर्वजों की स्मृति में स्मारक के रूप में उनके वंशजों की ओर से बनवाई गई है। इसमें मुख्य रूप से तत्कालीन ठाकुर महासिंह, भभूतसिंह, गुमानसिंह चंपावत सहित उनकी महारानियों की मृत्यु के बाद उनके वंशजों ने बनवाई थी। जिनकी देखरेख व पूजा-अर्चना भी उन्हीं की ओर से की जाती है। धीरे धीरे समय के साथ ये छतरियां अब जीर्ण शीर्ण होकर क्षतिग्रस्त हो रही हैं।
कभी लगते थे मेले
ऎतिहासिक मान्यताओं के अनुसार सैकडों वर्ष पूर्व तत्कालीन जागीरदारों की मृत्यु के पpात् उनकी धर्मपत्नियां उनके साथ सती हो जाया करती थीं। इसी के चलते इन छतरियों के सतियों के देवल के नाम से पहचाना जाता है। इन्हीं छतरियों पर वर्ष में एक बार भव्य मेला लगता था। जहां इन सतियों के देवल की पूजा-अर्चना व नवदम्पती की जात भी दी जाती थी लेकिन दिवराला सतीकांड के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय की ओर से सती महिमा मंडन पर लगाई गई रोक के पpात् यहां मेलों का आयोजन हो रहा है।
हो रही है उपेक्षा
जैसलमेर जिले में पर्यटन विकास व पुरातत्व धरोहरों के संरक्षण को लेकर चल रहे सरकारी महकमें की ओर से भी इन पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण को लेकर कभी भी कोई पर्याप्त इंतजाम व कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। चंूकि चार वर्ष पूर्व जिला प्रशासन की ओर से शक्तिस्थल से इन छतरियों तक डामर सडक का निर्माण करवाया गया था ताकि पर्यटक इन छतरियों तक आसानी से पहुंचे सके लेकिन इन छतरियों के संरक्षण व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।
बुधवार, 17 मार्च 2010
घूटियों भर नै बचाय लिया राज
एक नटणी आपरै झीणा करतबां सू सगळा मुलक में चावीही। एकर उदैपुर में उण री रांमत मंडी। राणौजी नटणी ने कह्यौं-एड़ी रांमत बता जिकी ली कोंई नीं देखी व्हैं। नटणी कह्यौं-बड़ौं काम, म्हैं तौ करतब जाणूं, पण देखण वाळा री ई सरधा चाहीजे। आप देखी चावौं तौ म्हैं भरत माथै पीछोला पार कर जावूं। रांणौजी नै विसवार नीं व्हियौ। अंचभा सूं पाछै खरायौ, कंाई पीछोला ? नटणी कह्यो-हां, पीछौला। आपनै दीखै आ पीछौला।अेकर छोड, भरत माथै चार वळा फिर जावूं। रांणौजी जांणियौ के आ बात ई कोई व्हैणी हैं ! वै कह्यौं - थे, थूं पीछौला भरत माथै अेक वळा ई पार कर जावै तौ मैवाड़ रौ आधौ राज थारै नांव कर दूं। जे पार नीं व्हीं तौ म्हारौ राज छौड़नै किणी दूजा रजवाड़ा में थू रांमत नीं मांड़ सकेला। पीछोला री इण तीर सू उण तीर भरत बांधीजी। नटणी रांतम करण सारू भरत माथै चढी। अलेखूं निजरां नटणी रै पगां साम्हीं पड़ी। ओ कंाई! व तौ जमीं माथै चालै ज्यूं भरत माथै चालण ढूकी।देखण वाळां रा सांस ऊंचा चढग्या। रांणौजी रौ काळजौ उंचै चढग्यौं। ठाकर ठेठर कह्यो-हजारूं माथा दियां जकां नै ई मेवाड़ री पांती नीं मिळी अर आप इण नटणी री रांमत माथै आधौ राज देवणौ कबूल कर लियौ, अंदाता जुलम हैं। रांणौजी देखियौ के नटणी तो आधेटै पूगण वाळी हैं। नटणी तौ पीछोला पार जावैला। पार करियां आधौ राज देवणौ पड़ैला। नटे ई कीकर! मेवाड़ री आंन माथै पांणी फिर जावैला। जबांन में बंधग्यौ। पाखती ई अेक जाट उभौ हौ। कह्यौं-अनदांता कोप नीं करै तौ म्है उपाव कर दूं। जाट कह्यौ-जे इण सूं बांजी अर आंन रैवती व्हैला तौ म्है राख देवूंला। वौ तीर रै पाखती ई नटिया रै डैरै पूंगौ। नटणी आधेटा सूं सली पार व्हेगी। उणरै हांचळा में फेर पांनौ आवण ढूकौ हौ। वा आपरा बेटा रौ ध्यांन करियौ। वा फेर खाथी सिरकण ढूकी। पांणी रै हिबोळां रै टाळ कोई आवाज नीं ही। जांणै आवाज खुद सूं चिराळी सुणीजी। चिराळी नटणी रै कानां पूगी। वा तुरंत आपरै बैटठा री चिराळी ओळख लीवी। रांमत करती मां रौ ध्यान चूकौ। नटणी तौ भरत माथा सूं पीछौला री लैरां मंे पडग्यी। चैधरी रै पाखती आतां ई ठाकर ठेठर कह्यौ-तरवारां सूं राज नीं बचै जकौ औ जाट बाळक रै चूंटिया भरनै बचाय लिया।
सोमवार, 8 मार्च 2010
शादी के सात माह बाद पत्नी पैसा लेकर छू!
अहमदाबाद. यहां पर एक महिला ने शादी के सात माह तक पति संग रहने के बाद उसने अपना गिरगिट का रंग दिखा दिया। जैसे ही सात माह पूरे हुए पत्नी ने एक लाख रुपया और घर का कीमती सामान लेकर रफूचक्कर हो गई। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले अमराईवाडी पुलिस स्टेशन ने शादी कराने के लिए पैसा कमाने वाले गिरोह का पर्दाफास किया था। उसके बाद नरोडा में इस प्रकार की घटना सामने आई जिसके बाद पुलिस के कान फिर से खड़े हो गए हैं।प्राप्त जानकारी के अनुसार नरोडा ठक्करनगर निकोल गांव में गणपतभाई रावलीभाई परमार ने खेडा जिला के नडियाद के वसो गांव के शंकरभाई वालजीभाई परमार की लड़की मीना के साथ 2008 में शादी की थी। जिसके बाद इन दोनों में तकरार हो जाने की वजह से अलगाव हो गया। मीना से दूसरी बार शादी करने के लिए जब गणपतभाई ने उसके परिवार वालों से बात की तो उन्होंने 21 हजार रुपए की मांग की। इसके बाद गणपतभाई ने मीना की मांग को स्वीकार करते हुए पैसा दे दिया। शादी के सात माह बाद मीना ने घर से नगदी समेत कीमती समाना लेकर रफूचक्कर हो गई। गणपत भाई ने नरोडा पुलिस में मामला दर्ज करा दिया है। पुलिस मीना और उसके परिवार के सदस्यों की खोजबीन कर रही है।
पति की चिता को पत्नी ने दी मुखाग्नि
राजकोट. प्रेमविवाह करने वाले जोड़ों को परिवार और समाज में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ज्यादातर प्रेमविवाह का विरोध करने वाले परिवार और समाज अपने बच्चों को माफी देकर स्वीकार कर लेते हैं लेकिन कुछ ऐसे परिवार वाले होते हैं जो बेटे-बेटियों की मौत के बाद भी इनसे दूरी बनाए रखते हैं।भावनगर में एक प्रेमीजोड़े के साथ कुछ इसी तरह की घटना घटी। प्रेमविवाह को परिवार वालों ने नहीं स्वीकारा और इन्हें परिवार से अलग कर दिया गया। मोरबी के जांबुडिया गांव में मेहनत-मजदूरी करने वाले एक जोड़े पर कुदरत का कहर ऐसे टूटा कि सब कुछ तितर-बितर हो गया। आकस्मिक घटना में पति की मौत हो जाने के बाद भी परिवार वालों ने कोई खोज-खबर नहीं ली। यहां तक कि पति के अंतिम क्रियाकलाप में भी कोई नहीं आया जिसके बाद पत्नी ने अपने दिल पर पत्थर रखकर पति की चिता को मुखाग्नि दी।
गौरतलब है कि भावनगर के समढियाणा गांव में अतुल खोडाभाई मकवाणा ने बरवा गांव की मंजुला नाम की लड़की से प्रेम विवाह किया था। परिवार वालों ने इन दोनों की शादी को अस्वीकार करके इन्हें परिवार से बेदखल कर दिया। ये दोनों गांव के खेत में घर बनाकर अपना जीवन-यापन शुरु कर दिया। आठ साल से दिन-रात मेहनत मजदूरी करने वाले इस जोड़े को भगवान खुश न देख सके। खबर के मुताबिक 25 फरवरी को अतुल मकवाणा जांबुडिया गांव के हाईवे पर स्थित होटल में शराब पीने के लिए गया हुआ था। इस होटल में गैस फटने की वजह से अतुल गंभीर रूप से घायल हो गया जिसे पास के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां पर अतुल की मौत हो गई।
इन्हें दुल्हनिया कौन बनाएगा
राहुल के स्वयंवर में हारी निकुंज और हरप्रीत का अब क्या होगा। चूंकि डिम्पी मिसेस महाजन बन चुकीं है, सवाल अब ये उठता है कि आखिर निकुंज मलिक और हरप्रीत से शादी कौन करेगा। पूरा देश देख चुका है कि इन दोनों ने राहुल के लिए प्यार की पींगे भरी थी। उनके साथ डेट पर गई, राहुल के लिए सेक्सी अंदाज में डांस भी किया। तो सवाल ये है कि शो में आने से पहले सामान्य परिवार की इन दोनों लड़कियों को अब कौन पत्नी स्वीकार करेगा।राहुल ने खुलकर शो पर उन सभी लड़कियों के साथ फ्लर्ट किया, उन्हें चूमा भी और गले भी लगाया। इस सबके बाद सभी लड़कियां सेलिब्रिटी तो बन गई लेकिन मिसेस महाजन केवल डिम्पी बन पाई। हां अगर ये मॉडलिंग या किसी इसी तरह की फील्ड में अपना करियर बनाने यहां आई थी तो फिर तो आना सफल रहा, लेकिन अगर सचमुच सिर्फ राहुल की दु्ल्हनियां बनने आई थी तो बेचारी हरप्रीत निकुंज और उन सारी लड़कियों का क्या होगा ये बड़ा सवाल है।चलो बाकी लड़कियों की बात छोड़ भी दें तो, निकुंज और हरप्रीत तो राहुल की नाम की मेहंदी लगा चुकी थी, हल्दी भी लगवाई थी, चुनरी भी ओढ़ी थी। क्या ये दोनों वह सब भूल पाएंगी, या उन्हें दोबारा दुल्हन बनाते समय लोग वो सारी बातें भूल पाएंगे।ऊंचा होता आकाश
मैंने अब तक कि जिंदगी में अपने चारों ओर जितनी तेजी से औरतों की दुनिया को बदलते देखा है, उस गति से शायद ही कुछ और बदला हो। स्त्री ने शून्य से उठकर शिखर तक का सफर तय किया है। अब तक जिस दुनिया के दरवाजे उनके लिए बंद थे, उन्होंने हर उस दरवाजे को खटखटाया और वहां अपने लिए जगह बनाई। उन्होंने उन इलाकों में घुसपैठ की, जो अब तक सिर्फ पुरुषों के क्षेत्र समझे जाते थे। स्त्री का यह सफर बहुत लंबा और कीमती है क्योंकि उसने शून्य से शुरुआत की थी। औरत ने यह करके दिखाया है कि वह किसी भी मामले में पुरुषों से कम या कोई सेकेंड सेक्स नहीं है। मन, बुद्धि, अंतरात्मा, मेधा और कौशल हर चीज में वह उतनी ही संपूर्ण मनुष्य है, जितना कि कोई पुरुष। स्त्री के ऊंचे होते आकाश ने हमें आंखें ऊंची करके उसकी ओर देखने के लिए मजबूर किया है।एक दूसरा चेहरा भी है। बेशक बंधनों को तोड़कर, नियमों को दरकिनार करके अपनी जगह बनाने वाली स्त्रियों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। आज भी हमारे देश की बहुसंख्यक स्त्रियां पितृसत्तात्मक पाबंदियों के बीच एक छोटी सी दुनिया में जिंदगी बिताने को मजबूर हैं। जिंदगी, जहां कोई खिड़की नहीं खुलती, जहां से होकर कोई राह नहीं निकलती, जहां न सूरज उगता है, न रोशनी की किरण फूटती है। जहां हवाओं की आवाजाही पर भी पहरे हैं। सारी उन्नति के बावजूद ये भी इस उन्नत देश की स्त्रियों की एक शक्ल है, जिससे आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। पर वक्त के साथ बदलाव की उम्मीदें और-और पुख्ता होती जाती हैं।आज उम्र के इस पड़ाव पर जब तीस साल पहले की दुनिया को लौटकर देखती हूं तो सुख और आश्चर्य से भर जाती हूं।
आज औरत अपनी आंखों में ढेर सारी चमक लिए कितने आत्मविश्वास से भरी हुई है। वो ज्ञान की चमक से रोशन है, वह दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना रही है। अब वह सिर्फ रिश्तों में, किसी की मां या किसी की पत्नी के रूप में ही नहीं जानी जाती। उसकी अपनी एक आजाद हैसियत है। उसके विचार ओढ़े हुए या किसी और के लादे हुए नहीं हैं। वह संसार को अपनी निगाहों से देख रही है। अपनी तरह से गढ़ रही है।उनके रहन-सहन और पहनावे में भी बहुत फर्क आया है। हमने जिंदगी भर सिर्फ साड़ी या सलवार-कुर्ता ही पहना। आज तो लड़कियां परिधान के भी बने-बनाए नियमों और बंधनों से भी बाहर निकल रही हैं। हर मामले में उनकी अपनी पसंद-नापसंद है। अब वो सिर्फ सिर हिलाने वाली कठपुतली भर नहीं हैं। अब वह आगे बढ़कर पूरी शिद्दत से ‘ना’ भी कह सकती हैं।सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। इन बदलावों का जहां एक सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है, वहीं कुछ नकारात्मक असर भी नजर आते हैं। स्त्री ने तो अपनी सीमाओं को तोड़ा और बहुत आगे निकल गई, लेकिन पुरुष अब भी वहीं के वहीं हैं। बदलती हुई स्त्री के साथ-साथ पुरुष बदलने को तैयार नहीं हैं। घर से बाहर निकलकर पुरुषों के क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली औरत से भी घर के भीतर पुरुष की अपेक्षाएं वही पचास साल पुरानी हैं। घर की सीमाओं में पुरुष उसके कार्यक्षेत्र को साझा करने के लिए तैयार नहीं है। लिहाजा रिश्तों में एक किस्म का असंतुलन पैदा हुआ है। तलाक, अलगाव और बिना शादी के अकेली रहने वाली स्त्रियों की संख्या बड़े शहरों और महानगरों में बहुत तेजी से बढ़ रही है।
पलों में मिट गया पीढ़ियों का अंधेरा
बाड़मेर. सूजी देवी ने छह साल पहले बेटे को जन्म तो दिया लेकिन उसकी सूरत देख नहीं सकी, क्योंकि वह जन्म से मोतियाबिंद की शिकार थी। उसकी पीड़ा तब और बढ़ गई जब उसे पता चला कि जिसे उसने जन्म दिया है, उसे भी मोतियाबिंद है, लेकिन कहते हैं कि जो पीड़ा देता है, वही उसे दूर भी करता है। बाड़मेर जिले की चाडों की ढाणी के जगताराम की झोली खुशियों से और उसकी पत्नी व बेटे की जिंदगी अनगिनत रंगों से भर गई। अब सूजी देवी और उसका छह साल का बेटा दोनों ही जान गए हैं कि आकाश नीला होता है और गुलाब कई रंगों का होता है। पैरों में गांठों की वजह से विकलांग जगताराम ने जीवन में परेशानियां झेलीं।उसने कुछ साल पहले मोतियाबिंद के कारण अंधेरों में जीने वाली सूजी देवी से विवाह कर उसका जीवन संवारने का फैसला किया। सूजी के पिता भी जन्म से मोतियाबिंद के शिकार थे। छह साल पहले सूजी ने बालाराम को जन्म दिया तो जगताराम और सूजी दोनों ही दुखों के सागर में डूब गए क्योंकि बालाराम भी मोतियाबिंद का शिकार निकला। मां और बेटा एक दूसरे की सूरत तक नहीं देख पाए। जीवन अपनी गति से चल रहा था कि पिछले दिनों नेत्र ज्योति अस्पताल में नेत्र चिकित्सा शिविर लगा। इसमें पालनपुर से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों को सूजी और बालाराम की आंखों में छिपी रोशनी की किरणों दिखाई दीं। डॉ. रामलाल, डॉ. दक्षेस मोदी और बाड़मेर के डॉ. डीके स्वर्णकार ने इन मां-बेटे की आंखों का ऑपरेशन किया। शनिवार को दोनों की पट्टी खोली गई तो सभी खुशी से उछल पड़े। सूजी ने अपने लाल और उसके पिता को देखा तो उसकी आंखें गीली हो गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकता नहीं
जागरूकता के अभाव में ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मोतियाबिंद का इलाज कराने आगे नहीं आते। जन्म से ही मोतियाबिंद के शिकार मां और बेटा अब दुनिया देख सकेंगे।
महिला आरक्षण बिल आज पेश नहीं होगा
नई दिल्ली. राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पर बचे बवाल को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कल सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला किया है। जिसके बाद यह साफ हो गया है कि यह बिल भले ही राज्यसभा में पेश कर दिया गया हो लेकिन इस पर वोटिंग आज नहीं होगी।
राज्य सभा में पहुंचे मार्शल राज्यसभा में राजेडी और सपा सांसदों के हंगामे के बीच सांसदों को काबू करने के लिए मार्शल बुला लिए गए हैं। कई बार राज्यसभा को स्थगित करने के बाद शाम छह बजे इस बिल को पास करने के लिए वोटिंग करवाने का फैसला किया गया था। राज्यसभा में बिल को पेश कर दिया गया है। राजेडी सांसदों के द्वारा सभापति हामिद अंसारी से छीनकर बिल की प्रतियों को फाड़ने पर इन सांसदों पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है। इनके खिलाफ अनुशासनत्मक कार्रवाई की जा सकती है।
मुलायम-लालू ने समर्थन वापस लिया
समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ने कहा है कि अगर महिला आरक्षण विधेयक वर्तमान स्वरुप में ही संसद से पारित हो जायेगा तो वे मनमोहन सरकार से समर्थन बकायदा वापस ले लेंगे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने आज यहां संसद परिसर में पत्नकारों के सामने घोषणा की। दोनों नेता महिला आरक्षण विधेयक के मुद्दे पर भाजपा और कांग्रेस पर प्रहार करते हुए यह घोषणा की। उन्होंने सरकार से इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग करते हुए कहा कि सरकार ने इस विधेयक को पेश करने से पहले सभी राजनीतिक दलों से सलाह- मशविरा नहीं किया।
साईं भक्ति की आड़ में चलता था देह व्यापार
नई दिल्ली. पुलिस ने एक ऐसे हाई प्रोफाइल स्वामी को गिरफ्तार किया है, जो दुनिया के सामने साईं प्रवचन देता और मंदिर का संचालन करता लेकिन इसकी आड़ में वह धड़ल्ले से देह व्यापार का धंधा चला रहा था। पुलिस ने इस स्वामी समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया है जिसमें से एक दलाल है व छह लड़कियां हैं। गिरफ्तार लड़कियों में से दो पूर्व एयरहोस्टेस हैं जबकि एक भावी मॉडल है, जो एमबीए कर रही है। यह स्वामी चित्रकूट (यूपी) में 200 बिस्तरों का अस्पताल बनवा रहा है।दक्षिणी जिला पुलिस उपायुक्त एचजीएस धालीवाल ने बताया कि साकेत थाना प्रभारी इंस्पेक्टर पंकज सिंह को सूचना मिली कि पीवीआर साकेत के पास कुछ लोग हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट चला रहे हैं। सूचना के आधार पर एसआई संजय शर्मा और दलीप कुमार को सादी वर्दी में उक्त स्थान पर ग्राहक के तौर पर भेजा गया। कुछ दूरी पर मुखबिर व पुलिस की बाकी की टीम भी तैनात हो गई।
मंगलवार, 2 मार्च 2010
भायली सीरखड़ी
सीरखड़ी तूं म्हारी भायली है, सियाळे री सहेली है
लपट-झपट कर थारै सागे, सारी रात बितावौं
खाटा-मीठा सुपना देखों, किणने बात बतावों
मूतण री हाजत हो जावै, थर-थर कांपे काया
पाछा आय थांसूं मिलों तो, पाछा हो जावों न्याया
काती सूं फागण तक थारो, साथ घणो है आछो
निर्मोही आदत है म्हारी, घिर नहीं जोउं पाछौ
तो ही तूं नहीं होवै रीसोणी, मिले प्रेम सूं पाछी
माइतों रा श्राद बीतियों पाछी आवै कातीरजाई ने इंगित करती मायड़ भाषा री आ कविता वैद्यराज सत्यनारायण जी व्यास सा म्हनै सुणाई। बै ब्लॉग और साइट रा मतलब तो को समझे नीं लेकिन म्हनै बियों कयो चावै जठे छाप। मायड़ में सहज सृजन री ई प्रवृत्ति रे साथै ब्लॉग पर आपांरी मायड़ री सेवा रे रंग चढ़ावणे रो प्रयास शुरू कर चुकियो हूं, बाकी लोगां ने भी घणे मान सूं न्यौतो दे रयो हूं। आवै जिका सृजनकार सिर माथै पर। एक बार सोची कि ई कविता रो हिन्दी अर्थ भी दूं। फेर सोचियो कि दूसरे लोगां ने पढ़ण दूं। कोई कैसी तो हिन्दी में भी अनुवाद लिख देसों। पण खांटी मारवाड़ी रो जिको आनन्द है बो अनुवाद में कोनी....
कोई भूल चूक होवे तो माफी चाउं
विद्वजणों री सलाह री उडीक रैसी
चमत्कारी है धानसा के महादेव
मोदरा। कहते है ईश्वर सभी प्राणियों का अपनी संतान की तरह पालन पोषण करता है और यदि कोई भी मनुष्य ईश्वर के प्रति आस्था रखता है तो ईश्वर भी उस पर कृपा दृष्टि बनाए रखते है। ऎसा ही उदाहरण है धानसा गांव के भक्त भाकरसिंह राठौड़ का। जिनकी जलंधरनाथजी के प्रति प्रगाढ़ भक्ति के कारण क्षेत्र में जलंधरनाथ मंदिर की स्थापना हो सकी। करीब 400 वर्ष पूर्व धानसा गांव में कृषक भाकरसिंह जालोर के सिरे मंदिर के जलंधरनाथ को अपना आराध्य मानते थे। वे प्रत्येक सोमवार को पैदल धानसा से जालोर के सिरे मंदिर में आराध्य की पूजार्चना के लिए जाते थे। लेकिन एक बार बारिश (हलोतरा) का मौसम था। भाकरसिंंह कृषि कार्यो में व्यस्त थे और इस कारण वे सोमवार को सिरे मंदिर जाना भूल गए। उनके घर से भाई सोमवार के दिन यह समझ कर भात (खाना)देरी से लाए कि भैया के सोमवार है और वे सिरे मंदिर गए होंगे। जब वे खेत पहुंचे तो भाकरसिंह उन्हें खेत में कार्य करते हुए दिखे और उन्होंने देखा कि भाकरसिंह ने काफी कार्य भी किया है। उन्होंने जब इस बारे में भाकरसिंह से पूछा कि क्या वे सिरे मंदिर नहीं गए। तब भाकरसिंह को पता लगा कि वे सिरे मंदिर जाना भूल गए है। वे उसी समय सभी कार्य छोड़कर सिरे मंदिर के लिए रवाना हो गए। रास्ते में उन्हें नाथ के वेश में स्वयं जलंधरनाथ मिले। उन्होंने भाकरसिंह से पूछा कि कहां जा रहे हो तो उन्होंने कहा कि वे सिरे मंदिर जलंधरनाथजी के दर्शन के लिए जा रहे है। इस पर उन्होंने जलंधरनाथ से उसी स्थान पर मिलवाने की बात कही तो भाकरसिंह को विश्वास नहीं हुआ। तब नाथ के वेश में जलंधरनाथ ने उन्हें एक खेजड़ी की सूखी लकड़ी दी और कहा कि यह लकड़ी सात दिन में हरी हो जाएगी। इस पर भाकरसिंह ने वह लकड़ी ले ली और उसे उसी स्थान पर खड़ा कर दिया। जब भाकरसिंह ने पीछे मूड़ कर देखा तो उन्हें उस स्थान पर पगलिए मिले जहां पर नाथ खड़ा था। तब उन्हें विश्वास हो गया कि वे स्वयं जलंधरनाथ ही थे। सातवें दिन खेजड़ी की लकड़ी पर कोंपल फूट गई। उसी स्थान पर एक पत्थर का बड़ा सा कुण्ड, नंदी और शिवलिंग भी मिला।उस कुण्ड में काफी समय तक सात गांवों के लिए सामूहिक प्रसादी भी होती थी, लेकिन कुछ विवाद हो जाने से यह प्रथा बंद हो गई। क्षेत्र समेत आसपास के गांवों के ग्रामीणों की इस मंदिर के प्रति आस्था देखते ही बनती है
कुर्सी का दंगल, पहलवानी में जुटे डॉक्टर
राज्य के मेडिकल कॉलेजों के आला डॉक्टरों का दिल आजकल कामकाज में कम, प्रिंसिपल की कुर्सी के लिए चालू दंगल में ज्यादा लगा हुआ है। एसएमएस मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल की कुर्सी के दंगल में लोगों की दिलचस्पी सर्वाधिक है। दंगल में एक-दूसरे पर रंग डालने के लिए अधिकतर ने काला रंग चुना है। कुर्सी की दौड़ में जिसको जिससे खतरा है, वे एक-दूसरे पर काला रंग डालने की फिराक में हैं। यह काला रंग आरोप-प्रत्यारोप का है। इस बीच खबरियों से यह भी चर्चा आ रही है कि जो लोग इस कुर्सी पर बैठे हैं, कायदों से परे, उन्हीं का मन कुर्सी से भरता नजर नहीं आ रहा। यहां हम आपको सीधे लफ्जों में बता दें कि यह दंगल एसएमएस मेडिकल कॉलेज और उसकी सीमाओं से परे तीन और मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य के लिए जमा है। इनमें जयपुर, अजमेर, कोटा और जोधपुर मेडिकल कॉलेज अखाड़े बने हुए हैं। अजमेर और जोधपुर मेडिकल कॉलेज की सीटें प्राचार्य पदों के रिक्त स्थान को भरने के लिए कई दिन से विकल्प तलाश रही हैं तो कोटा मेडिकल कॉलेज में बैठे प्राचार्य की कुर्सी भी खाली होने वाली है। फिर भी सर्वाधिक दिलचस्पी राजधानी जयपुर की मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य की सीट को लेकर है। नियमानुसार 31 अगस्त को मौजूदा प्राचार्य का कार्यकाल पूरा हो रहा है। ऐसे में प्राचार्य पद की दौड़ के लिए इसी कॉलेज से 13 उम्मीदवार मैदान में कूद पड़े हैं। हम आपको बता दें कि इस सीट के लिए कई तिकड़म लगानी जरूरी रहती है। इतिहास के पन्नों को उठाकर देखा जाए तो सामने आता है कि पोस्ट के लिए बने नियमों के अलावा भी बातें हैं, जिनके मायने ज्यादा हैं। जैसे किस उम्मीदवार के पास किस नेताजी का नाम जुड़ा है..‘गांधीजी’ का आशीर्वाद जो ‘ऊपर’ तक दिखाना जरूरी है..वगैरह-वगैरह। अब यह दंगल मुहब्बत और जंग दोनों का है।
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