मंगलवार, 2 मार्च 2010

भायली सीरखड़ी

 सीरखड़ी तूं म्‍हारी भायली है, सियाळे री सहेली है

लपट-झपट कर थारै सागे, सारी रात बितावौं

खाटा-मीठा सुपना देखों, किणने बात बतावों

मूतण री हाजत हो जावै, थर-थर कांपे काया

पाछा आय थांसूं मिलों तो, पाछा हो जावों न्‍याया

काती सूं फागण तक थारो, साथ घणो है आछो

निर्मोही आदत है म्‍हारी,‍ घिर नहीं जोउं पाछौ

तो ही तूं नहीं होवै रीसोणी, मिले प्रेम सूं पाछी

माइतों रा श्राद बीतियों पाछी आवै कातीरजाई ने इंगित करती मायड़ भाषा री आ कविता वैद्यराज सत्‍यनारायण जी व्‍यास सा म्‍हनै सुणाई। बै ब्‍लॉग और साइट रा मतलब तो को समझे नीं लेकिन म्‍हनै बियों कयो चावै जठे छाप। मायड़ में सहज सृजन री ई प्रवृत्ति रे साथै ब्‍लॉग पर आपांरी मायड़ री सेवा रे रंग चढ़ावणे रो प्रयास शुरू कर चुकियो हूं, बाकी लोगां ने भी घणे मान सूं न्‍यौतो दे रयो हूं। आवै जिका सृजनकार सिर माथै पर। एक बार सोची कि ई कविता रो हिन्‍दी अर्थ भी दूं। फेर सोचियो कि दूसरे लोगां ने पढ़ण दूं। कोई कैसी तो हिन्‍दी में भी अनुवाद लिख देसों। पण खांटी मारवाड़ी रो जिको आनन्‍द है बो अनुवाद में कोनी....

कोई भूल चूक होवे तो माफी चाउं

विद्वजणों री सलाह री उडीक रैसी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें