शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

कोयल गाती नहीं...गाता है

कोयल गाती नहीं...गाता है
Matrix News
भास्कर न्यूज . सिरोहीनर्सरी क्लास के बच्चों से लेकर कवियों, संगीतकारों के प्रिय पक्षी कोकिल के दीवाने सामान्य तौर पर यही जानते हैं कि काली कोयल बोल रही है, डाल-डाल पर डोल रही है, कूक कूक का गीत सुनाती...। लेकिन, यदि पक्षी विशेषज्ञों से बात करें तो वे तत्काल आपको बताएंगे कि कोयल गाती नहीं, बल्कि गाता है। दरअसल, मादा कोयल कभी उस तरह से नहीं गाती, नर कोकिल ही उतनी प्यारी आवाज में गाता है, जिसे सुनकर हर कोई आह्वालित होता है। वैसे, कोयल के बारे में जानना अपने आप में रोचक है लेकिन इसके साथ जरूरी है उनकी सुरक्षा। घनी अमराइयां उनके आवास हैं, जिनका पिछले दिनों काफी ह्रास हुआ है। शेष & पेज 9और यदि इस मीठी तान को सुनना है, तो उन अमराइयों, घने पेड़ों को बचाने के साथ लगाना होगा, जो इनके पसंदीदा बसेरा हैं।लगाने होंगे छायादार, सदाहरित पौधे : उदयपुर से सिरोही आने वाले मार्ग के साथ सिरोही माउंट आबू मार्ग, माउंट के आसपास पहले खूब अमराइयों का विशेष क्षेत्र है, जहां ये खूब रहते हैं। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से सड़क निर्माण से लेकर कई अन्य कारणों से छायादार पेड़ खूब धराशायी हुए हैं और उसके साथ इनके आवास उजड़ते जा रहे हैं। अब यदि आवाज के दीवाने इस पक्षी की हिफाजत चाहते हैं तो पहले जरूरी है कि अमराइयों के विनाश को रोककर नए पेड़ उस तरह के लगाए जाएं। होता यह है कि आम, जामुन आदि छायादार पेड़ काटे तो खूब जा रहे हैं, लेकिन नए पेड़ लगाए नहीं जा रहे हैं। जो पौधे लगाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश विदेशी प्रजाति के वे पौधे हैं, जो इन पक्षियों का बसेरा होता ही नहीं है। इसीलिए जरूरी है कि इस तरह के वृक्षों के पौधे भी लगाए जाएं।ग्रीष्मकालीन प्रवास : अपने देश में प्रवासी पक्षी सामान्य तौर पर शीतकाल में प्रवास करते हैं, लेकिन कोयल के साथ ठीक उल्टा है। यह ग्रीष्मकाल में अपने यहां प्रवास करने को पहुंचता है। इसे ठंड बर्दाश्त नहीं है और उससे बचने के लिए वह दक्षिण की ओर प्रस्थान कर जाता है। आम तौर पर यह अंतर्देशीय अर्थात अपने देश के भीतर ही प्रवास करता है, लेकिन कभी-कभार इसे प्रवास पर आस्ट्रेलियाई कंट्रीज में भी देखा गया है। बसंत व ग्रीष्म ऋतु इसका प्रजनन काल है, जिसमें नर मादा को रिझाने के लिए मीठी आवाज में गाता है। सामान्य तौर पर जब आम में बौर आना शुरू होते हैं और छोटी-छोटी अमियां दिखने लगती हैं, तो इसकी आवाज सुनाई देने लगती है। यह सर्वहारी जीव फल के साथ कीड़े-मकोड़े भी बड़े मजे से खाता है।स्वभाव से संकोची, नीड़ निर्माण से मतलब नहींराजपुताना सोसायटी ऑफ नेचुरल हिस्ट्री, राजस्थान के सलाहकार सत्यप्रकाश मेहरा के अनुसार कोयल कुक्कू कुल का पक्षी है, जिसका वैज्ञानिक नाम यूडाइनेमिस स्कोलोपेकस स्कोलोपेकस है। नर कोयल नीलापन लिए काला होता है, तो मादा तीतर की तरह धब्बेदार चितकबरी होती है। नर कोयल ही गाता है। उसकी आंखें लाल व पंख पीछे की ओर लंबे होते हैं। नीड़ परजीविता इस कुल के पक्षियों की विशेष नेमत है यानि ये अपना घोसला नहीं बनाती। ये दूसरे पक्षियों विशेषकर कौओं के घोंसले के अंडों को गिरा कर अपना अंडा उसमें रख देती है। स्वभाव से संकोची यह पक्षी कभी किसी के सामने पडऩे से कतराता है। इस वजह से इनका प्रिय आवास या तो आम के पेड़ हैं या फिर मौलश्री के पेड़ अथवा कुछ इसी तरह के सदाबहार घने वृक्ष, जिसमें ये अपने आपको छिपाए हुए तान छेड़ता है।

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